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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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पार्थिवप्रकरणम् १२५ आत्मा का कर्म (क्रिया) है, और आत्मा उसका कर्ता है। अर्थात् इन सबके अधिष्ठानभूत कूटस्थ होते हुए भी आत्मा में भ्रमवशात् क्रिया-कर्तृत्व की प्रतीति हुआ करती है। तस्मात् आत्मा तो स्वतः निष्क्रिय है, उस कारण उसका निष्क्रिय ब्रह्मत्व सिद्ध हो जाता है ॥ १९॥ निमीलोन्मीलने स्थाने वायव्ये ते न चक्षुषः । प्रकाशात्वान्मनस्येवं बुद्धौ न स्तः प्रकाशतः ॥ २० ॥ निमीलेति—आत्मा में कर्तृत्व के आरोप में यह दृष्टान्त दिया जा सकता है—नेत्र के गोलकों में पलकों को जो खोलना-बन्द करना आदि क्रिया होती है, वह तो वस्तुतः 'वायु' का कार्य है, 'नेत्र' का नहीं, क्योंकि 'नेत्र' तो तेजोमय हैं। उसी प्रकार 'मन' और 'बुद्धि' में भी क्रिया नहीं है, क्योंकि वे 'ज्ञानस्वरूप हैं, उनमें जो क्रिया प्रतीत होती है, वह 'प्राण' का कार्य है ॥ २० ॥ हृदयस्पर्शिनी अब दृष्टान्त देकर आत्मा में कर्तृत्व के आरोप को समझाते हैं—नेत्रगोलकों के स्थान पर पक्ष्मों (पलकों) का बन्द करना और खोलना (निमीलन-उन्मीलन) हुआ करता है, वह वायु का कार्य है, क्योंकि क्रियात्मक वायु में तदाश्रयता है। वह निमीलन-उन्मीलन, चक्षुरिन्द्रिय का कार्य नहीं है, क्योंकि चक्षुरिन्द्रिय तो प्रकाशरूप है, उस कारण उसमें क्रियाश्रयत्व उपपन्न नहीं हो सकता। तथापि अध्यासवशात् उन्मीलन-निमीलन का चक्षु में ही व्यवहार किया जाता है। उसी प्रकार मन और बुद्धि में भी चलनाचलनादि क्रिया नहीं है, क्योंकि वे प्रकाश (ज्ञान) स्वरूप हैं, उनमें जो क्रिया प्रतीत होती है, वह प्राण का कार्य है। तथापि उसका मन-बुद्धि पर आरोप किया जाता है, और 'चञ्चल मन तथा स्थिर बुद्धि' इस प्रकार व्यवहार हुआ करता है ॥ २० ॥ सङ्कल्पाध्यवसायौ तु मनोबुद्ध्योर्यथा क्रमात् । नेतरेतरधर्मत्वं सर्वं चात्मनि कल्पितम् ॥ २१॥ संकल्पेति—'संकल्प' और 'निश्चय' क्रमशः 'मन' और 'बुद्धि' के धर्म हैं। उनका परस्पर सांकर्य नहीं होता। अतः 'आत्मा' में ये सब अध्यस्त ही हैं, वास्तविक नहीं हैं ॥ २१ ॥ हृदयस्पर्शिनी मन का धर्म सङ्कल्प करना है और बुद्धि का धर्म अध्यवसाय (निश्चय) करना है। इस प्रकार व्यवस्था रहने से उनका परस्पर सांकर्य नहीं होता। ये सब आत्मा में अध्यस्त (आरोपित) हैं, वास्तव में नहीं हैं। क्योंकि कूटस्थ आत्मा में स्वतः कर्तृत्व का होना असंभव है, अविद्यादि जो जड़ पदार्थ हैं, उनमें स्वतन्त्र प्रवृत्ति का रहना असंभव है, जड़ पदार्थ और अजड़ (चेतन) पदार्थ दोनों का वस्तुतः सम्बन्ध बताना संभव नहीं। सम्पूर्ण सहेतुक संसारबन्धन का आत्मा में अध्यास मात्र (कल्पना मात्र, आरोपमात्र) किया जाता है। वास्तव में बन्धन नहीं है। अतः सर्वदा ही आत्मा, अद्वय ब्रह्मरूप है, यह सिद्ध होता है ॥ २१ ॥ स्थानावच्छेददृष्टिः स्यादिन्द्रियाणां तदात्मताम् । गता धीस्तां हि पश्यन् ज्ञो देहमात्र इवेक्ष्यते ॥२२॥ स्थानेति—जैन दार्शनिक 'आत्मा' को देहपरिमाणवाला कहते हैं, तब उसमें ब्रह्मत्व (ब्रह्मरूपता) कैसे होगा ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि इन्द्रियों की दृष्टि अपने-अपने गोलकों से परिच्छिन्न है, और वह तदाकारता को प्राप्त हो जाती है, तथा 'बुद्धि' का देह और इन्द्रियों से तादात्म्य है। अतः बुद्धि का साक्षी होने से 'आत्मा', देहपरिमाणवाला प्रतीत होता है ॥ २२ ॥ हृदयस्पर्शिनी पहले बता चुके हैं कि देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, और शून्य—इनमें से कोई भी आत्मा नहीं है, किन्तु इनसे विलक्षण ही कोई अन्य आत्मा है। अब देहादिकों से विलक्षण रहता हुआ भी वह आत्मा देहसमपरिमाण है,