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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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पार्थिवप्रकरणम् १२७ स्वाकारेति—जिन बौद्धों के मत में रूपादि बाह्य पदार्थ, ज्ञानाकार से भिन्न किसी अन्य ज्ञान के द्वारा अव- भासित होते हैं, उसी तरह जिनके मत में उससे भिन्न उनकी सत्ता नहीं है, वे एक प्रकार से पूर्व मतावलम्बियों के मत की असंगति को बताते हैं। विज्ञान वादी बौद्धों के मत में रूपादि बाह्य पदार्थों की सत्ता नहीं है, बुद्धि में रूपादि बाह्य पदार्थों के संस्कार (वासना) रहते हैं, उस कारण विज्ञान का ही अवभास मात्र होता रहता है। तथा वे ज्ञान, ज्ञानान्तर से प्रकाशित होते हैं, यह भी मानते हैं। परन्तु शून्यवादी बौद्ध, ज्ञान और ज्ञेय दोनों की ही सत्ता नहीं मानते। ये, विज्ञानवादी के मत को असंगत बताते हैं। इनको इस पारस्परिक मतभेद को दिखाकर उनके मत का खण्डन ग्रन्थकार ने कर दिया ॥ २४ ॥ हृदयस्पर्शिनी भिन्न-भिन्न वादियों पर दिये गये भिन्न-भिन्न दूषणों के परिज्ञानार्थ बौद्धों के मतभेद को प्रदर्शित करते हैं—रूपादि बाह्य आकारों का ज्ञान से अवभास मानने वाले बाह्यार्थप्रत्यक्षवादी वैभाषिक हैं। किन्तु विज्ञानवादी योगाचार बौद्ध, नील-पीतरूपादि बाह्य पदार्थों का अस्तित्व नहीं मानते, अपितु बुद्धिगत रूपादि संस्कार के कारण उन्हें विज्ञान के ही अवभास मात्र मानते हैं। और एक ज्ञान का दूसरे ज्ञान से प्रकाशित होना स्वीकार करते हुए वैभाषिक बौद्धों के मत को असंगत बताते हैं। किन्तु जिन बौद्धों के मत में वह विज्ञान भी नहीं है अर्थात् ज्ञान और ज्ञेय दोनों की सत्ता जो स्वीकार नहीं करते, अपितु 'सर्वं शून्यम्' कहते हैं, वे माध्यमिक शून्यवादी बौद्ध विज्ञानवादियों के मत को असंगत बताते हैं ॥ २४ ॥ बाह्याकारतवतो ज्ञप्तेः स्मृत्यभावः सदा क्षणात् । क्षणिकत्वाच्च संस्कारं नैवाधत्ते क्वचित्तु धीः ॥२५॥ बाह्येति—विज्ञानवादी बौद्धों के अनुसार 'ज्ञान' ही बाह्यविषयस्वरूप होने से, और ज्ञाता भी क्षणिक होने से सर्वदा ही स्मृति का अभाव होता है, तथा बुद्धि भी क्षणिक होने से वह अपने संस्कारों को उत्तरकालीन बुद्धि में कभी भी स्थापित नहीं कर सकती ॥ २५ ॥ हृदयस्पर्शिनी अब उन असंगतियों को बताते हैं—यदि ज्ञान ही बाह्य वस्तु के आकार में परिणत होता है, तो विषय की उत्पत्ति से पूर्व ज्ञान के साथ उसका सम्बन्ध होना संभव ही नहीं, और उत्पन्न होने पर भी उस वस्तु के क्षणिक होने से ज्ञान के साथ उसका संबन्ध होना असंभव ही है, अतः उसका प्रत्यक्ष अनुभव होना भी उपपन्न नहीं है। उस कारण वैभाषिक का बाह्यार्थप्रत्यक्षवाद उचित नहीं है। अतएव सौत्रान्तिक का बाह्यार्थ-नित्यानुमेयवाद भी अनुपपन्न है। परिशेषात् प्रतीयमान बाह्य विषय, ज्ञान का ही आकार है, अतः एकमात्र विज्ञान का ही अस्तित्व मानना चाहिये। किञ्च ज्ञाता को भी क्षणिक मानने वाले विज्ञानवादी के अनुसार पूर्व क्षण में रहने वाली बुद्धि का उत्तर क्षण में होने वाली बुद्धि से संबन्ध न रहने के कारण अपने अनुभव किये हुए पदार्थ का संस्कार वह नहीं छोड़ सकती। उस कारण उसे पूर्वानुभूत पदार्थ की स्मृति भी नहीं होनी चाहिये। किन्तु स्मृति होती तो है। (अतः विज्ञानवादी का मत स्वीकारा नहीं है। उसी प्रकार शून्यवादी का मत युक्तिविरुद्ध होने से सर्वथैव अग्राह्य है) ॥ २५ ॥ आधारस्याप्यसत्त्वाच्च तुल्यतानिमित्ततः । स्थाने वा क्षणिकत्वस्य हानं स्यान्न तदिष्यते ॥२६॥ आधारस्येति—ये बौद्ध गण 'बुद्धि' का कोई आधार (साक्षी) भी नहीं स्वीकार करते, इसलिये पूर्ववर्ती और उत्तरवर्ती ज्ञानों की तुल्यता का भी कोई हेतु नहीं है। और यदि वे किसी को आधार मानते हैं, तो उनके क्षणिकत्व- सिद्धान्त का भंग होता है। सिद्धान्त का भंग होना तो उन्हें इष्ट नहीं है ॥ २६ ॥