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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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पार्थिवप्रकरणम् १३९ तथाऽन्येषां च भिन्नत्वाद्युगपज्जन्म नेष्यते । गुणानां समवेतत्वं ज्ञानं चेन्न विशेषणात् ॥५३॥ तथेति—उसी प्रकार एक-दूसरे से भिन्न होने के कारण दुःख, इच्छा, प्रयत्न आदि अन्य गुणों की भी उत्पत्ति एक साथ होना शक्य नहीं है। यदि 'उन सभी गुणों का आत्मा के साथ समवायसम्बन्ध होना ही उनका ज्ञान है' [ऐसा कहा जाय]—किन्तु यह कथन भी उचित न होगा, क्योंकि उन गुणों का विशेषण रूप से व्यवहार [ज्ञात सुख, ज्ञात दुःख] किया जाता है ॥ ५३ ॥ हृदयस्पर्शिनी जैसे ज्ञान और सुख की युगपत् उत्पत्ति न होने से उनमें ग्राह्य-ग्राहकत्व की अनुपपत्ति बताई उसी प्रकार परस्पर भिन्न होने के कारण दुःख, इच्छा, प्रयत्नादि गुणों का भी एक साथ (युगपत्) उद्भव होना संभव नहीं है। क्योंकि एक आत्म-मनःसंयोग से अनेक कार्यों का होना संभव नहीं है। मूलगत 'च' से एक आश्रयवालों में विषय- विषयिभाव भी नहीं होता। सुखादिकों में ज्ञानभास्यता भले ही न रहे, एक आत्मा में उन सब का समवायसम्बन्ध से होना ही उनका ज्ञान है, किन्तु यह भी ठीक न होगा, क्योंकि 'ज्ञातं सुखम्, ज्ञातं दुःखम्'—इस प्रकार उनका विशिष्ट व्यवहार दृष्टिगत होता है। इससे यह स्पष्ट हुआ कि सुखादि, आत्मा के गुण न होकर आत्मा के विषय हैं और आत्मा उनका साक्षी है ॥ ५३ ॥ ज्ञानेनैव *विशेषत्वाज्ज्ञानाप्यत्वं स्मृतेस्तथा । सुखं ज्ञातं मयेत्येवं तवाज्ञानात्मकत्वतः ॥५४॥ ज्ञानेनैवेति—सुख-दुःखादि गुणों का विशेषण 'ज्ञान' है, यह ऊपर बता चुके हैं। अतः सुख-दुःखादि गुण, ज्ञान के द्वारा विशेषित रहने से और 'मुझे सुख ज्ञात हुआ' ऐसी स्मृति होने से स्पष्ट होता है कि सुखादि की प्राप्ति में 'ज्ञान' साधन है। किन्तु तुम्हारे [वैशेषिकों के] मत में तो आत्मा को ज्ञानस्वरूप नहीं कहा गया है। अतः सुखादि गुणों की सिद्धि नहीं हो सकती ॥ ५४ ॥ हृदयस्पर्शिनी उपर्युक्त कथन को ही और अधिक स्पष्ट करते हैं—ज्ञान के द्वारा सुखादि के विशेषित होने से वे सुखादि ज्ञान के द्वारा प्राप्य हैं। अर्थात् ज्ञान के द्वारा आहित संस्कारों से उत्पन्न स्मृति के विषय होने के कारण भी सुखादिकों में ज्ञानव्याप्यता समझनी चाहिए। 'मुझे सुख ज्ञात हुआ'— इस प्रकार स्मृति होने के कारण सुखादिक, ज्ञान के द्वारा प्राप्त (ग्राह्य) होते हैं। यदि सुखादि ज्ञान को ज्ञानविशिष्ट आत्मसमवेत होना ही मानते हो तो वह ठीक नहीं है, क्योंकि क्षणिक आत्मविशेषगुणों का युगपत् समवाय होना संभव नहीं है। अन्यथा आत्मगत संख्या, परिमाण आदि गुणों का भी ग्रहण होने लगेगा। उसी तरह सुखादि ज्ञान को केवल आत्मसमवेत होना भी नहीं कह सकते क्योंकि तुम्हारे (वैशेषिकों के) मत में आत्मा ज्ञानस्वरूप न होने के कारण सुखादि की सिद्धि नहीं हो सकती। वैशेषिकों के मत में आत्मा ज्ञानस्वरूप नहीं है, किन्तु मन के साथ आत्मा का संयोग होने पर उसमें ज्ञानादि गुणों का अनुभव होता है। इससे यह सिद्ध हुआ कि आत्मा घटादि के समान केवल द्रव्यमात्र है। अतः जड़रूप होने से उससे समवेत होने मात्र से सुखादि की सिद्धि नहीं हो सकती। क्योंकि सभी तो जड़ हैं। तुम्हारे मत में ज्ञान भी स्वयं- प्रकाश नहीं है। अतः केवल आत्मसमवेत होने मात्र से सुखादि के ज्ञान की सिद्धि नहीं हो सकती ॥ ५४ ॥ सुखादेर्नात्मधर्मत्वमात्मनस्तेऽविकारतः । भेदादन्यस्य कस्मान्न मनसो वाऽविशेषतः ॥५५॥ सुखादेरिति—तुम्हारे [वैशेषिकों के] मत के अनुसार भी 'आत्मा' निर्विकार, विभु और अनेक है। अतः सुखादि उसके धर्म तो हो नहीं सकते तथा भेद में किसी प्रकार की कोई विशेषता न रहने के कारण वे किसी दूसरे आत्मा या मन के धर्म क्यों नहीं होंगे ? ॥ ५५ ॥

  • विशेष्यत्वा०—पाठान्तरम् ।