BharatKosha
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

Page 175 of 364

Read in context
Page 175

सम्यङ्मतिकरणम् १४९ हृदयस्पशिनी देवताभक्ति की तरह गुरुभक्ति भी विद्या प्राप्ति¹ का अन्तरङ्ग साधन है। कहा भी है— 'यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः²' ।। इतना बताकर गुरुपरम्परा को प्रणाम कर रहे हैं। पद, वाक्य और प्रमाण के रहस्य को जानने वाले अर्थात् पदों की शक्ति और वाक्यों की तात्पर्यमर्यादा के अनुसार प्रमाणों को जानने वाले (पद-वाक्य-प्रमाणज्ञ) अथवा पद-वाक्य और अनुमानादि को जानने वाले दीपकस्वरूप अर्थात् बिना आयास के ही सर्वार्थप्रकाशक जिन गुरुचरणों ने वेद के रहस्य को प्रकट किया है, उन्हें मैं सर्वदा प्रणाम करता हूँ ।। २ ।। यद्वाक्सूर्यांशुसंपातप्रणष्टध्वान्तकल्मषः । प्रणम्य तान् गुरून् वक्ष्ये ब्रह्मविद्याविनिश्चयम् ।।३।। यदिदिति—जिनकी वाणी स्वरूप रविरश्मियों के संस्पर्श से मेरे अज्ञानरूप पापराशि का ध्वंस हो गया है, उन गुरुचरणों में प्रणाम कर मैं ब्रह्मविद्या के निश्चायक न्याय को बता रहा हूँ ।। ३ ।। हृदयस्पशिनी सामान्यतया आचार्यपरम्परा को प्रणाम करके विशेषतया अपने गुरु को प्रणाम करते हुए अपने उद्देश्य की प्रतिज्ञा करते हैं—जिसके वाक्यरूप रविकिरणों के सम्पर्क से मेरे अज्ञानरूप पापराशि का नाश हो गया, उस श्री गुरु को प्रणाम कर मैं ब्रह्मविद्या का निश्चय कराने वाले एक विशेष न्याय को बताऊँगा ।। ३ ।। आत्मलाभात्परो नान्यो लाभः कश्चन विद्यते । यदर्था वेदवादाश्च स्मार्ताश्चापि तु याः क्रियाः ।।४।। आत्मेति—संसार में आत्म लाभ से बढ़कर अन्य कोई लाभ नहीं है। जिसे प्राप्त करने के लिये ही सम्पूर्ण वेदवाद और स्मृतिप्रतिपादित क्रियाएँ ( कर्मकाण्ड ) हैं ।।४।। हृदयस्पशिनी ब्रह्मविद्या का विनिश्चय किसलिये बताया जायगा ? उत्तर यही होगा कि आत्मलाभ से बढ़कर अन्य कोई लाभ नहीं है। जिसके लिये समस्त वेदवचन हैं और समस्त स्मार्तवचन हैं, और जो वेद-स्मृतिविदित कर्म- परक वचन हैं, वे भी चित्तशुद्धिपरम्परया आत्मलाभ के लिये ही हैं ।। ४ ।। आत्मार्थोऽपि हि यो लाभः सुखायेष्टो विपर्ययः । आत्मलाभः परः प्रोक्तो नित्यत्वाद्व्रह्मवेदिभिः ।।५।। आत्मार्थ इति—संसार में जिस लाभ ( स्त्री-पुत्र-धन-गृह-आदि ) को सुख का कारण समझा जाता है, वह भी सब आत्मा के लिये ही होता है। वे ही सुखसाधनीभूत पदार्थ, किसी समय, किसी-किसी के लिये दुःखप्रद भी हो जाते हैं। परन्तु ब्रह्मज्ञ विद्वानों ने आत्मलाभ को परम लाभ कहा है, क्योंकि वह नित्य सुखमय है ।। ५ ।। हृदयस्पशिनी पुत्र आदि के लाभ से आत्मलाभ श्रेष्ठ रहने पर भी पुत्रादि का परित्याग करना आवश्यक होने के कारण आत्मलाभ के उपाय का आश्रय करना उचित नहीं है, क्योंकि वह (पुत्रादिकों का आश्रय करना) भी आत्म- सुख में हेतु है—इस प्रकार की आशंका होती है, किन्तु उसका समाधान यही है कि संसार में सुख के लिये जिस १. 'शास्त्रज्ञोऽपि स्वातन्त्र्येण ब्रह्मज्ञानान्वेषणं न कुर्यात्'—(मुं. उ. १।१।१२) भाष्ये तथा 'असम्प्रदायवित् सर्वशास्त्रविदपि- मूर्खवदेव उपेक्षणीयः—(गीताभाष्ये १३।२) २. ( श्वे. उ. ६।२३ )

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित) · Page 175 of 364 · BharatKosha