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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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सम्यङ्मतिप्रकरणम् १७१ से प्राण, मन और बुद्धि इन तीनों अन्तःकरणों अथवा जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं को त्यागकर अज्ञान महासागर से उत्तीर्ण (पार) हुआ पुरुष अचिरादिमार्गस्थ न होकर स्वयं आत्मनिष्ठ होता है, तथा अपनी आत्मा में ही समस्त गुणों को विलीन कर देने से वह निर्गुण हो जाता है और निरूपाधिक हो जाने से शुद्ध होता है, अतः स्वभावतः ही बुद्ध और मुक्त हो जाता है। अभिप्राय यह है कि पदार्थविवेक द्वारा वाक्यार्थज्ञान होता है, उससे अज्ञान की निवृत्ति होती है, तब स्वतः ही मुक्त हो जाने से बिना अचिरादिगति के ही ब्रह्म को प्राप्त हुए उस ज्ञानी विद्वान् को पुनः प्रपञ्च में आना नहीं पड़ता ॥ ५८ ॥ अजोऽहं चामरोऽमृत्युर्जरोऽभय एव च । सर्वज्ञः सर्वदृक् शुद्ध इति बुद्धो न जायते ॥५९॥ अजोऽहमिति—मैं जन्म रहित हूँ, अमर (ज्ञानरूप) हूँ, मृत्युरहित हूँ, जरारहित हूँ और भय से रहित हूँ तथा मैं सर्वज्ञ हूँ, सर्वसाक्षी और शुद्ध हूँ—इस प्रकार 'मैं ब्रह्म हूँ'—'अहं ब्रह्मास्मि' यह जाननेवाला अर्थात् अज्ञाननिद्रा से जगा हुआ पुरुष पुनः शरीर ग्रहण नहीं करता, यानी उसे पुनः जन्म नहीं लेना पड़ता ॥ ५९ ॥ पूर्वोक्तं यत्तमोबीजं तन्नास्तीति विनिश्चयः । तदभावे कुतो जन्म ब्रह्मैकत्वं विजानतः ॥६०॥ पूर्वोक्तमिति—आत्मज्ञानी पुरुष निश्चित रूप से यह जानता है कि पूर्वोक्त सुषुप्ति रूप अज्ञान है ही नहीं । तब ब्रह्मात्मैक्यज्ञान से सम्पन्न पुरुष की दृष्टि में अज्ञान का अभाव ही हो जाने से उसका पुनः जन्म कैसे हो सकेगा ? ॥ ६०॥ हृदयस्पर्शिनी प्रबुद्ध पुरुष के जन्म न लेने में हेतु यह है कि उस विद्वान् का यह निश्चय रहता है कि 'सुषुप्त्याख्यं तमो- ऽज्ञानम्' के द्वारा कहा गया जो सुषुप्तिरूप अज्ञान है, वह किसी भी काल में ( तीनों कालों में) नहीं है। इस प्रकार आत्मा और ब्रह्म का एकत्व समझनेवाले उस विद्वान् पुरुष की दृष्टि में अज्ञान का अभाव रहने से पुनः उसका जन्म कैसे हो सकेगा, क्योंकि कारण के अभाव में कार्य का भी अभाव रहता है। किसी भी काल में सत् वस्तु का ज्ञान होने मात्र से तिरोधान नहीं होता किन्तु ज्ञान का उदय होते ही इस अज्ञान का तो शुक्ति-रजत के समान तिरोधान हो जाता है ॥ ६० ॥ क्षीरात्सर्पिर्यथोद्धृत्य क्षिप्तं तस्मिन्न पूर्ववत् । बुद्ध्यादेर्ज्ञस्तथाऽसत्यान्न देही पूर्ववद्भवेत् ॥६१॥ क्षीरादिति—जैसे दूध (क्षीर) से निकाला गया घृत (सर्पि) दूध में पुनः मिला देने पर भी पहले की तरह वह उसमें नहीं मिल पाता, वैसे ही असत्य बुद्धि आदि से 'ज्ञ' के रूप में पृथक् किया गया देही (आत्मा) पहले की तरह अविवेकी नहीं हो सकता ॥ ६१ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'अहं ब्रह्मास्मि'—मैं ब्रह्म हूँ, इस प्रकार प्रत्यक्ष अनुभव करनेवाले विद्वान् का भी व्यवहार पूर्ववत् ही देखने में आता है, ऐसी स्थिति में उसके द्वारा किये जानेवाले धर्म-अधर्म के कारण उसे पुनः शरीरग्रहण (संसारप्राप्ति) तो करना ही होगा, यह शंका हो सकती है, उसका उत्तर इस श्लोक के द्वारा दे रहे हैं—जिस प्रकार दूध से निकाला हुआ घृत (नवनीत) पुनः उसी निःसार किये गये दूध में मिलाये जाने पर भी पूर्ववत् नहीं मिल पाता, उसी प्रकार असत्य (मिथ्या) बुद्धि आदि के समुदाय से पृथक् किया हुआ आत्मा अर्थात् 'अहं ब्रह्मास्मि' वाक्य से अपने को ब्रह्मरूप समझनेवाला वह विद्वान् पुनः देहद्वयसंघात (समुदाय) का अभिमान नहीं करता। अर्थात् पूर्ववत् वह अविवेकी नहीं होता है। अहंकारयुक्त पुरुष के किये कर्म ही उसके बन्धन के हेतु होते हैं, निरहंकारी पुरुष के कर्म बन्धक नहीं होते। भगवान् स्वयं कहते हैं— "यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते । हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते"१ । १. ( भ. गी. १८।१७ )