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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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तत्त्वमसिप्रकरणम् १८९ तस्मादिति-इसलिए शमादिषट्सम्पत्तिमान् पुरुष को 'प्रसंख्यान' से निष्पन्न होनेवाले ब्रह्मात्मैक्य के विरुद्ध जो कर्मनिष्ठता है, उसका त्याग करके आत्मस्वरूप के अनुभवार्थ प्रयत्नपूर्वक प्रसंख्यान का ही अभ्यास करना चाहिए ॥ १८॥ हृदयस्पर्शिनी अतः शम-दमादि से सम्पन्न व्यक्ति को, प्रसंख्यानरूप साधन और उससे होने वाले ब्रह्मात्मैक्यरूप साध्य के विरोधी कर्मनिष्ठत्व का त्याग कर आत्मसाक्षात्कार के लिये प्रयत्नपूर्वक प्रसंख्यान का ही अभ्यास करना चाहिये । अर्थात् प्रसंख्यानरूप साधन और तत्साध्य (फल) आत्मैक्यसाक्षात्कार इन दोनों का विरोधी जो कर्मनिष्ठत्व है, उसका त्याग करे । यह सब वही कर सकता है, जो शम-दम-उपरति आदि षड्गुणों से युक्त होता है ॥ १८ ॥ नैतदेवं रहस्यानां नेति नेत्यवसानतः । क्रियासाध्यं पुरा श्राव्यं न मोक्षो नित्यसिद्धतः ॥१९॥ नैतदिति—उपर्युक्त पूर्व पक्ष के उपस्थित होने पर सिद्धान्ती का कहना है कि तुम जैसा समझ रहे हो, वैसी बात नहीं है, क्योंकि उपनिषद् वाक्यों का तात्पर्य, दृश्य पदार्थों के निषेध को अवधि जहाँ समाप्त हो जाता है, उस 'परब्रह्म' में है। अतः प्रसंख्यान-विधि में उनका तात्पर्य नहीं है। क्रिया (कर्म) से साध्य होनेवाले फल को वेद के पूर्वकाण्ड ने बता दिया है। 'मोक्ष' तो नित्य सिद्ध फल है। अतः उसे क्रियासाध्य नहीं कह सकते ॥ १९ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार पूर्वपक्ष करने पर सिद्धान्ती उत्तर देता है-आप जैसा कह रहे हैं वैसी बात नहीं है, क्योंकि उपनिषद्ववाक्यों के तात्पर्य का पर्यवसान दृश्य का निषेध करते हुए उसके अवधिभूत परब्रह्म में होता है, प्रसंख्यान विधि में नहीं। जो फल, क्रिया (कर्म) से प्राप्य होने वाला है, उसका उल्लेख वेद के पूर्वकाण्ड में किया गया है, वहीं वह सुनाई देता है। उपनिषदों में उसका उल्लेख नहीं है। मोक्ष तो नित्यसिद्ध है, उसकी प्राप्ति कर्मानुष्ठान से नहीं हो सकती। पूर्वपक्षी बताये कि वेदान्तवाक्यों में प्रसंख्यान का साक्षात् विधान है या वर्तमानोपदेश होने से फलवचना- नुपत्या विधान की कल्पना की जाती है? प्रथम पक्ष का स्वीकार करना उचित न होगा क्योंकि रहस्यभूत उपनिषद्ववाक्यों की विध्यर्थता तो हो नहीं सकती, उन वेदान्तवाक्यों के द्वारा दृश्य का निषेध करते-करते निषेधावधिभूत ब्रह्मात्मस्वरूप में उन वाक्यों का पर्यवसान होता है। द्वितीय पक्ष इसलिये उचित न होगा, जो क्रियासाध्य फल है, वह पुरा (पूर्वं) काण्ड में श्राव्य है, उपनिषदों में नहीं। उपनिषदों में श्रूयमाण मोक्ष, क्रियासाध्य नहीं है, क्योंकि वह तो नित्यसिद्ध है, नित्यसिद्ध होने से वह साध्य नहीं है ॥ १९ ॥ पुत्रदुःखं यथाऽध्यस्तं पित्राऽदुःखे स्व आत्मनि । *अहंकर्त्रा तथाऽध्यस्तो नित्यादुःखे स्व आत्मनि ॥२०॥ पुत्रेति-जिस प्रकार पिता के द्वारा अपने दुःखरहित आत्मा में पुत्र के दुःख का आरोप कर लिया जाता है, उसी प्रकार प्रत्येक मनुष्य अपने दुःखरहित आत्मा में 'मैं कर्ता हूँ' यह आरोप (अध्यास) कर लेता है ॥ २० ॥ हृदयस्पर्शिनी तत्त्वमस्यादि वाक्य, अपरोक्ष, अद्वितीय ब्रह्मात्मज्ञान द्वारा उस अज्ञान की और उसके द्वारा अध्यस्त हुए दुःखित्वादि संसार की निवृत्ति कराता है, यह बताने के लिये अज्ञान से अध्यस्त दुःखादि के विषय में दृष्टान्त बता रहे हैं-जिस प्रकार पिता अपने ज्वरादिदुःखरहित आत्मा में पुत्र के दुःख का आरोप कर लेता है, उसी प्रकार यह मानव प्राणी अपने नित्य दुःखरहित अर्थात् सर्वदा दुःखादिसंसाररहित अपने स्वरूपभूत निरुपाधिक आत्मा में 'मैं कर्ता हूँ'-ऐसा अध्यास करता रहता है। क्योंकि इसने अपने स्वरूपभूत आत्मा को साभास अन्तःकरण से अविविक्त समझ लिया है। अर्थात् अविवेकलक्षण अविद्या से उसे दुःखादिधर्मवाला मान लिया है। इस पद्य में आनन्दगिरि ने 'अहं कर्ता' पाठ लिया है, अतः 'स्वे आत्मनि' दुःखादिः, जोड़ लेना चाहिये । रामतीर्थ ने 'अहं कर्ता' पाठ रखा है।

  • अहं कर्ता० - पाठान्तरम् ।