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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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जीवन को सकारने की प्रक्रिया में गुरु का विशेष स्थान है क्योंकि इह वा पारलौकिक फलेच्छा के त्याग से लौकिक व शास्त्रीय विधि-निषेध उसे प्रवृत्त नहीं कर सकते। दृष्ट फल के लिए गुरु ही उसे श्रवणादि सब साधनों को बताकर प्रवृत्त करेगा व प्रत्येक शिष्य के संस्कारानुसार उसके विशेष मार्ग का प्रतिपादन कर सकेगा। शिष्यों के अनन्त संस्कारों के भेद होने से यहाँ नियतता ( Codification ) सम्भव ही नहीं है। अतः गुरुशरण के बिना निवृत्तिमार्ग पेंदी से रहित लोटा हो जायगा। 'यो हि यस्माद् विरक्तः स्यात् नासौ तस्मै प्रवर्तते । लोकत्रयाद्विरक्तत्वान्मुमुक्षुः किमितीहते ( उ० सा० तत्त्वमसि० २३०)। 'स गुरुस्तारयेद्युक्तं शिष्यं शिष्यगुणान्वितम् ब्रह्मविद्याप्लवेनाशु स्वान्तध्वान्त- महोदधिम्' ( उ० सा० सम्यङ्मति० ५३ ) । ब्रह्मज्ञान का वास्तविक फल तो सद्योमुक्ति ही है। 'सद्योमुक्तिकारणमात्मज्ञानम् ( ब्र० सू० भा० १-१-६)। इस अनुभव का स्पष्ट रूप से प्रतिपादन कटे हाथ का दृष्टान्त है। काट कर फेंक दिये हाथ के साथ अपने को हाथवाला जैसे नहीं मानते वैसे ही विवेक की तलवार से सभी अनात्म विशेषणों को त्याग देने पर निर्विशेष ज्ञानी रह जाता है। 'छित्त्वा त्यक्तेन हस्तेन स्वयं नात्मा विशेष्यते…………अनात्मत्वेन तस्माज्ज्ञो मुक्तः सर्वविशेषणैः ( उ० सा० विशेषापोह० १, २)। पर यह ज्ञान आत्मा का है, बुद्धि का नहीं। बुद्धि में ही विद्या व अविद्या हैं, यह साङ्ख्य की मान्यता है। पर अद्वैत ज्ञानी के स्वानुभव में बुद्धि भी स्वरूप से आत्मा से अभिन्न ही है। इसे बड़े सुन्दर रूप से आचार्य ने बुद्धि व आत्मा के संवाद के द्वारा निरूपित किया है। बुद्धि कहती है कि आपके किसी सम्बन्धी का ही शायद मेरे से उपकार हो जाय, तो आत्मा कहती है कि मैं एकाकी हूँ, अतः मेरा न कोई अंश, गुण या सम्बन्धी है और न मैं किसी का अङ्ग या सम्बन्धी हूँ और असङ्ग होने से मुझे तेरा कोई प्रयोजन नहीं। अतः अब तुम निवृत्त ही हो जाओ। पर तुम्हें भी घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि तुम स्वयं भी तो मेरे अज्ञान से ही कल्पित होने से मुझ में अध्यस्त हो। अतएव मैं ही तुम्हारी वास्तविकता या अधिष्ठाता हूँ। 'अहं ममैको न मदन्यदिष्यते तथा न कस्यापि अहमस्म्यसङ्गतः । असङ्गरूपोऽहमतो न मे त्वया कृतेन कार्यं तव चाद्यवत्त्वतः' ( उ० सा० मतिविलापन० ४)। अतः भौतिक रूप से देह को छोड़ना आवश्यक नहीं है। उसकी प्रातिभासिकता से मुक्ति में विघ्न नहीं होता। इसकी दृढ़ता के लिये ही परिसंख्यानप्रकरण है। इसमें 'गुणा गुणेषु वर्तन्ते' न्याय से अपने शत्रु-मित्र या उदासीन का भाव नष्ट हो जाता है। शत्रु आदि इस संघात पर ही क्रिया या चिन्तन करते हैं और संघातारूप न होने से मैं उनकी शत्रुता का विषय नहीं। परम कारण तो अनात्मा की तुच्छता ही है। यह अद्वैत का विश्व को परम शान्ति का सन्देश है। इसको यदि बुद्धि में संस्कार रूप से किञ्चित् भी स्थान मिल जाय तो युद्ध, हिंसा, संघर्ष, प्रतियोगिता आदि को स्थान ही न रह जाय। स्थितप्रज्ञ, गुणातीत, भगवद्भक्त, तुरीयातीत, अतिवर्णाश्रमी आदि शब्दों से ऐसे ज्ञानी के शरीर का व्यवहार निरूपित किया गया है। इसका उद्देश्य ज्ञानी के लिये विधि करना नहीं है परन्तु साधकों को जीवन-प्रणाली बतलाना है। वेदान्त धर्म का यही प्राण है क्योंकि यह ऐसी वास्तविकता है, जो जीवन्मुक्त के बाह्याचरणों से उपलक्षित होती है और यज्ञादि अन्य धर्मों के पारलौकिक फल का स्थान ले लेती है। पर स्वर्गादि फल कभी अपरोक्ष नहीं होते, लेकिन ज्ञान की यह अवस्था ज्ञानियों में अपरोक्ष रूप से प्रकट है। वह मानो खिड़की है, जिससे ईश्वर का प्रत्यक्ष होता है। अप्पर का स्पष्ट कथन है कि शिवभक्त व शिव में कोई भेद नहीं है। ईसा के विषय में भी यही कहा जाता है कि वहाँ आदमियत व देवभाव युगपत् मौजूद है। परन्तु ईसाई धर्म की मान्यता है कि केवल ईसा में ही यह सम्भव है, जब कि वेदान्त मानता है कि प्रत्येक मानव में यह सम्भव है। हिन्दू धर्म का इतिहास इस बात में प्रमाण है कि यह युगलभाव सभी कालों में किसी-किसी में व्यक्त होता ही रहता है। जैसे वर्तमान ईसाई मान्यताओं से ईसा का परीक्षण नहीं हो सकता वैसे ही उन ज्ञानियों के सम्प्रदायविशेषों से उनका परीक्षण नहीं हो सकता। परन्तु उसकी आवश्यकता भी नहीं है क्योंकि हमें तो अपने युग के प्रत्यक्ष ज्ञानियों से ही मतलब होना चाहिये। विट्- जेन्सटाइन ( Wittgenstein ) अपने दर्शनान्वेषण ( Philosophical Investigation ) नामक ग्रन्थ में कहते हैं कि भाषा एक ऐसा चित्र है जो हमको मोह में डालकर रखता है। इसे ही वेदान्त माया कहता है। नामरूपात्मक सृष्टि में नाम की प्रधानता को मानना ही पड़ता है। वेदान्त का एक पक्ष तो शब्दस्फोट या नाद को ही रूप का कारण स्वीकारता है। पर जब तक मोह रहता है तब तक हम मोहक की अवास्तविकता को नहीं जान सकते। उसे किसी भी नाम से कहा

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