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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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तत्त्वमसिप्रकरणम् २०९ ही है। ग्राहक (प्रत्यय = ज्ञान) स्वयंप्रकाश होता हैं अर्थात् ज्ञानमात्र स्वयं प्रकाशित होते हैं और वे स्वयं भी प्रकाशरूप हैं, ऐसा बौद्ध कहते हैं और वे प्रत्यय (विज्ञान) से भिन्न किसी अन्य प्रकाशक (ग्राहक) की सत्ता का निषेध करते हैं।। ७२ ॥ यद्येवं नान्यदृश्यास्ते किं तद्धारणमुच्यताम् । भावाभावौ हि तेषां यौ नान्यग्राह्यौ सता यदि ॥७३॥ यदीति—बौद्ध विद्वान् यदि ऐसा कहते हैं कि वे प्रत्यय (विज्ञान) समूह किसी अन्य के दृश्य नहीं हैं, तो यह बताओ कि उसका निवारण कैसे किया जाय ? उसके उत्तर में कहते हैं कि उन प्रत्ययों के उत्पत्ति और विनाश यदि किसी अन्य स्वतःसिद्ध साक्षी से ग्राह्य नहीं हैं तो भी उन्हें चिदाभास से ग्राह्य समझने की कोई आवश्यकता नहीं है ॥ ७३ ॥ हृदयस्पर्शनी प्रत्ययों (ज्ञानों) के ग्राहक के रूपमें किसी अन्य स्थिर पदार्थ को न मानकर प्रत्यय (ज्ञान) को ही ग्राह्य और ग्राहक के आकार में बौद्ध मानते हैं, तो उनका मत अनुभवानुसारी होने से आभास का अभ्युपगम न करने में उनका निराकरण किस प्रकार करना चाहिये ? इस आशय से अपने यूथ से पूछते हैं—यदि बौद्ध लोग यह कहते हैं कि प्रत्यय (ज्ञान) किसी अन्य के दृश्य नहीं हैं, तो उनके इस कथन का किस प्रकार से निषेध किया जाय ? ऐसा पूछने पर यूथ्य ने उत्तर दिया कि उन प्रत्ययों के जो भाव और अभाव (उत्पत्ति और विनाश) हैं, वे यद्यपि किसी अन्य स्वतःसिद्ध साक्षी से सर्वदा ग्राह्य नहीं होते, तथापि जिसमें प्रत्ययों के भावाभाव होते हैं, उनका ग्राहक 'सोऽहम्' इस प्रत्यभिज्ञान के बल से अन्वयी स्थायी आत्मा सिद्ध हो जाता है, तो आभासकी कल्पना करने की क्या आवश्यकता ? अर्थात् उन्हें चिदाभास से ग्राह्य मानने की कोई आवश्यकता नहीं है ॥ ७३ ॥ अन्वयी ग्राहकस्तेषामित्येतदपि तत्समम् । *अचित्तित्वस्य तुल्यत्वादन्यस्मिन् ग्राहके सति ॥७४॥ अन्वयीति—उन ग्राह्यों का ग्राहक यदि किसी स्थायी को माना जाय तो वह भी उन ग्राह्य प्रत्ययों के समान जड़ ही होगा, क्योंकि उस स्थायी ग्राहक का कोई अन्य ग्राहक रहने पर उसका जड़त्व (अचेतनत्व) भी उन प्रत्ययों के समान ही है ॥ ७४ ॥ हृदयस्पर्शनी इस प्रकार स्वयूथ्य के द्वारा कहे जानेपर सिद्धान्ती सोचता है कि इतने मात्र उत्तर से बौद्धमत का निवारण होना शक्य नहीं है, अतः पूर्वोक्त उत्तर में दोषप्रदर्शन कर रहे हैं। प्रत्यभिज्ञा के बलपर किसी स्थायी ग्राहक को सिद्ध करने पर भी उन प्रत्ययों के तुल्य वह भी जड़ ही कहा जायगा, क्योंकि उसका कोई अन्य ग्राहक होनेपर उसका अचेतनत्व भी प्रत्ययों के समान ही होगा। बौद्धलोग विषय और उसके ग्राहक दोनों को ही विज्ञानरूप मानते हैं। उनके इस मतका खण्डन करते हुए यह बताया जा रहा है कि जो लोग केवल बुद्धि और कूटस्थ चेतन की ही सत्ता स्वीकार करते हैं, उनका मत भी समीचीन नहीं है। बुद्धि के प्रत्ययों को ग्रहण करनेवाली वस्तु या तो स्वयंप्रकाश होगी या परप्रकाश्य होगी। यदि वह परप्रकाश्य है तो जड़ होने के कारण वह प्रत्ययों का प्रकाशन नहीं कर सकती, और यदि किसी प्रकार उसमें ऐसा सामर्थ्य माना भी जाय, तो यह प्रश्न होगा कि जिससे वह प्रकाशित होती है, वह वस्तु परप्रकाश्य है या स्वयंप्रकाश ? यदि उसे भी परप्रकाश्य कहें तो अनवस्था दोष उपस्थित होता है। और यदि स्वयंप्रकाश कहते हैं तो साक्षी चेतन की सत्ता सिद्ध होती है। इस श्लोक में परप्रकाश्य वस्तु के प्रकाशक का खण्डन करने के बाद उन लोगों के मत का खण्डन करते हैं, जो साक्षी चेतन की सत्ता तो स्वीकार करते हैं, किन्तु चिदाभास को मानने की आवश्यकता नहीं समझते ॥ ७४ ॥ अध्यक्षस्य समीपे तु सिद्धिः स्यादिति चेन्मतम् । नाध्यक्षेऽनुपकारित्वादन्यत्रापि प्रसङ्गतः ॥७५॥

  • अचित्त्वस्यापि तु० — पाठान्तरम् । २७
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