BharatKosha
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

Page 241 of 364

Read in context
Page 241

तत्त्वमसिप्रकरणम् २१५ ब्रह्मास्मि' - मैं चेतन (ब्रह्म) हूँ, यह आगन्तुकवाक्यजन्य ऐक्यज्ञान नहीं हो सकेगा। अर्थात् चित्त में चिदाभास की सत्ता यदि न हो तो 'मैं दृशि (आत्मा) ब्रह्म हूँ', यह बुद्धि (ज्ञान) नहीं होगी। केवल चित्त तो जड़ है और चिन्मात्र (आत्मा) कूटस्थ है ॥ ८९ ॥ सदस्मीति धियोऽभावे व्यर्थं स्यात्तत्त्वमस्यपि । युष्मदस्मद्विभागज्ञे स्यादर्थवदिदं वचः ॥९०॥ सदिति—'मैं सत्स्वरूप हूँ' इस प्रकार की बुद्धि के अभाव में 'तत्त्वमसि' यह महावाक्य भी व्यर्थ हो जायगा । यह महावाक्य तो युष्मत्पदवाच्य 'जड़ वस्तु' और अस्मत्पदलक्ष्य 'आत्मा' का विभाग (विवेक, भेद) समझने वाले पुरुष के लिये ही सार्थक हो सकता है ॥ ९० ॥ हृदयस्पर्शिनी 'अहं ब्रह्मास्मि' यह ज्ञान यदि न हो तो क्या हानि है ? इस प्रश्न के होनेपर यह उत्तर दिया है कि 'अहं ब्रह्मास्मि' यह ज्ञान नहीं हुआ तो ऐक्यग्राहक 'तत्त्वमसि' यह महावाक्य ही व्यर्थ (अप्रमाण) हो जायगा। यदि कहें कि वह वाक्य व्यर्थ हो जाय तो क्या क्षति है ? क्योंकि उस वाक्य के सभी श्रोताओं को तत्काल 'ब्रह्मास्मि' इस प्रकार की बुद्धि उत्पन्न होती दिखाई भी तो नहीं देती। इसका उत्तर यह है कि 'अधिकारिणः प्रमितिजनको वेदः' अधिकारियों को ज्ञान करानेवाला 'वेद' होता है' इस न्याय से सम्यक्पदार्थविज्ञान वाले का ही वाक्यार्थ बोध (वाक्यार्थ ज्ञान) में अधिकार होता है। अतः अनात्म पदवाच्य (युष्मत्पदवाच्य) जड़ वस्तु और आत्मा के भेद का ज्ञान रखने वाले पुरुष के प्रति ही यह वाक्य अर्थवत् (सार्थक) होता है, सभी के लिये (अनधिकारियों के लिये) यह वाक्य झटिति बोधक नहीं है ॥ ९० ॥ ममेदंप्रत्ययौ ज्ञेयौ युष्मद्येव न संशयः । अहमित्यस्मदोष्ठः स्यादयमस्मीति चोभयोः ॥९१॥ ममेति—जिन वस्तुओं के विषय में 'मम' (मेरा) और 'इदम्' (यह) ज्ञान होता है, उन्हें युष्मत्पदवाच्य ही समझना चाहिये, इसमें सन्देह नहीं है। तथा 'अहम्' (मैं) यह ज्ञान, अस्मत्पदवाच्य 'व्यावहारिक आत्मा' में होता है। उसी तरह 'यह' (देहादि) में हूँ'-यह ज्ञान, आत्मा और अनात्मा दोनों ही में हो सकता है ॥ ९१ ॥ हृदयस्पर्शिनी उसी युष्मद्-अस्मत् के विवेक को बताते हैं। जिन पुत्रादि अनात्म पदार्थों में 'इदम्' 'मम' (यह-मेरा) यह ज्ञान (प्रत्यय) होता है, निःसन्देह उन्हें 'युष्मत्' पदवाच्य ही समझना चाहिये । पुत्रादि बाह्य पदार्थों का देहाध्यास- परंपरा से ही अस्मदर्थ में प्रवेश होता है। अतः बाह्यार्थ सम्बन्ध भी अनात्मधर्म ही है, यह उचित ही कहा गया है। 'अहम्' (मैं) यह ज्ञान, अस्मत्पदवाच्य व्यावहारिक आत्मा में (अहंकार में) माना जाता है। तथा 'यह (देहादि) मैं हूँ' ऐसा ज्ञान, आत्मा और अनात्मा दोनों में ही हो सकता है ॥ ९१ ॥ अन्योन्यापेक्षया तेषां प्रधानगुणतेष्यते । विशेषणविशेष्यत्वं तथा ग्राह्यं हि युक्तितः ॥९२॥ अन्योन्येति- इन आत्मविषयक और अनात्मविषयक ज्ञानों (प्रत्ययों) में एक-दूसरे की अपेक्षा से प्रधानता और अप्रधानता मानी जाती है। उसी प्रकार इनके विशेषण-विशेष्य भाव को भी युक्तिसहित समझना चाहिये ॥ ९२ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मानात्मविषयक प्रत्ययों के संकीर्ण और असंकीर्णरूप विषयों को बताकर उक्त विवेक के लिये गुण-प्रधान भाव से विशेषण-विशेष्यभाव को स्पष्ट करते हैं । इन आत्मविषयक और अनात्मविषयक प्रत्ययों