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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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२१८ उपदेशसाहस्री अतिरिक्त किंचिन्मात्र भी मैंने नहीं देखा' ऐसा परामर्श करनेवाला मनुष्य, अपनी दृष्टि (चैतन्य) का निषेध नहीं करता। किन्तु केवल प्रत्यय का निषेध करता है। 'प्रतीयते इति प्रत्ययः' इस व्युत्पत्ति से प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय रूप सभी विशेष का ग्रहण किया जाता है। तस्मात् परस्परव्यभिचारिता होने से दृष्ट, नष्ट स्वभाववाली मिथ्याभूत अवस्थाओं से भिन्न अव्यभिचारी, चिद्रूप, साक्षी, सत्य आत्मा है, यह विवेक सिद्ध होता है॥ ९७॥ स्वयंज्योतिर्न हि द्रष्टुरित्येवं संविदोऽस्तिताम् । कौटस्थ्यं च तथा तस्याः प्रत्ययस्य तु लुप्तताम् ॥ स्वयमेवाब्रवीच्छास्त्रं प्रत्ययावगती पृथक् ॥९८॥ स्वयमिति—इस अवस्था में 'यह पुरुष स्वयंप्रकाश है', उसी तरह 'द्रष्टा की दृष्टि का लोप नहीं होता'—ये श्रुति वचन स्वयं ही उस अवस्था में चैतन्य के अस्तित्व और कौटस्थ्य (कूटस्थता) और उसके प्रत्यय के लोप को बताते हैं। इसलिये 'प्रत्यय' और 'ज्ञान' परस्पर भिन्न हैं॥ ९८॥ हृदयस्पर्शिनी ऊपर निर्दिष्ट किये गये अन्वय-व्यतिरेक शास्त्रसम्मत हैं, केवल अपनी बुद्धि का कल्पनाविलास मात्र नहीं है, यह विश्वास दिलाने के लिये शास्त्र बताते हैं। "अत्रायं पुरुषः स्वयं ज्योतिः"१ "नहि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते"२ ये शास्त्रवाक्य बता रहे हैं कि इस अवस्था में यह पुरुष स्वयंप्रकाश होता है तथा द्रष्टा की दृष्टि का लोप नहीं होता। इस प्रकार चेतना के सद्भाव (अस्तिता) को और उसकी कूटस्थता (निर्विकारता) को श्रुति ने बताया है। तथा प्रत्यय (प्रमाण-प्रमाता-प्रमेय) की लुप्तता (लोप) अर्थात् असत्ता को "न तु तद् द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद् विभक्तम्"३—इत्यादि शास्त्र ने स्वयं ही बताया है। अतः प्रत्यय और अवगति (ज्ञान) पृथक् (असंकीर्ण) हैं, शास्त्र ने ही इनका विवेचन किया है॥ ९८॥ एवं विज्ञातवाक्यार्थे* श्रुतिलोकप्रसिद्धितः । श्रुतिस्तत्त्वमसीत्याह श्रोतुर्मोहापनुत्तये ॥९९॥ एवमिति—इस प्रकार श्रुतिवचन और लोकप्रसिद्धि अर्थात् 'अन्वय-व्यतिरेक' के द्वारा वाक्यार्थ का जिसे ज्ञान हो गया हो, उसी पुरुष के मोह (अज्ञान) की निवृत्ति के लिये श्रुति 'तत्त्वमसि' का उपदेश करती है॥ ९९॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार अवान्तरवाक्यकृत युष्मदस्मद् विवेक को उपपत्ति से बताकर, पदार्थतत्व का ज्ञान जिसे हो चुका है, ऐसे पुरुष में ही यह महावाक्य सफल विज्ञान को उत्पन्न करता है। इस प्रकार श्रुति और लोक की प्रसिद्धि से अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा जिसे अवान्तर वाक्यार्थ का ज्ञान हो गया है, उस पुरुष के मोह की निवृत्ति के लिये (सकार्य अविद्या की निवृत्ति के लिये) महावाक्यात्मिका 'तत्त्वमसि' श्रुति 'तू ब्रह्म है' ऐसा उपदेश करती है॥ ९९॥ ब्रह्मा दाशरथेर्यद्वदुक्त्यैवापानुदत्तमः । तस्य विष्णुत्वसंबोधे न यत्नान्तरमूचिवान् ॥१००॥ ब्रह्मेति—जिस तरह ब्रह्मदेव ने 'हे राम ! तुम विष्णु हो'—इस वाक्य को कह कर ही दशरथकुमार राम का 'अज्ञान' दूर कर दिया था। ब्रह्मा जी को उन्हें 'विष्णु' होने का बोध कराने में किसी अन्य प्रयत्न का आश्रय नहीं करना पड़ा॥ १००॥ १. (वृ. उ. ४।३।९, १४) २. (वृ. उ. ४।३।२३) ३. (वृ. उ. ४।३।२३-३०)

  • वाक्यार्थे—इति नै. सि. ४।२४ पाठः ।
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