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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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वाक्य के श्रवणमात्र से विज्ञानरूप उक्त फल न हो तो वहाँ कार्य की कल्पना अवश्य करनी होगी। अन्यथा अर्थवादादि- वाक्य के तुल्य स्वार्थ में उसका प्रामाण्य उपपन्न न हो सकेगा। यहाँ तो तत्क्षण ही फल का अनुभव होने से वैसी कल्पना की कोई आवश्यकता ही नहीं है। किञ्च यदि वाक्यश्रवण को सिद्ध ब्रह्मात्मज्ञानरूप तत्त्वज्ञान की उत्पत्ति में प्रमाण न माना जाय तो उसका अप्रामाण्य चार प्रकार से होगा—(१) विपर्यासलक्षण, (२) निष्फलत्वलक्षण, (३) संशय- लक्षण, (४) अनुपपत्तिलक्षण। उक्त चार प्रकारों में से प्रथम प्रकार के विपर्यासलक्षण अप्रामाण्य का खण्डन इस पद्य के उत्तरार्ध से किया गया है। अभिप्राय यह है कि 'तत्त्वमसि' इस वाक्योपदेश से पूर्व आत्मा की सत्ता है ही, क्योंकि कोई बाधक नहीं है। अतः 'तत्त्वमसि' इस वाक्योपदेश के द्वारा उसके यथावस्थित अज्ञान की निवृत्ति हो जाने पर आत्मस्वरूप का ही जो ज्ञान होता है, वह शुक्ति-रजत के समान अप्रामाणिक नहीं हो सकता। क्योंकि 'अहं ब्रह्मास्मि' इस अनुभववाक्य से यथावस्थित आत्मस्वरूप का ही अनुभव होता रहता है ॥ १०२ ॥

अशनायादिनिर्मुक्त्यै तत्काला जायते प्रमा। तत्त्वमस्यादिवाक्यार्थे त्रिषु कालेष्वसंशयः ॥१०३॥

अशनायेति—किञ्च आप्तवाक्य के श्रवण से जो 'तत्त्वज्ञान' होता है, वह भी क्षुधा-पिपासामय संसार की निवृत्ति का कारण होता है। उसी तरह 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्य के अर्थ में कभी किसी काल में भी किसी को संदेह नहीं होता है ॥ १०३ ॥

हृदयस्पर्शिनी

अप्रामाण्य का द्वितीय प्रकार भी ठीक नहीं है, क्योंकि अनुभवविरोध होता है। आप्तवाक्यश्रवण काल में ही होनेवाला तत्त्वज्ञान क्षुत्पिपासादिरूप संसार की निवृत्ति कराने में हेतु होता है। अतः वह निष्फल नहीं है। एवञ्च वाक्योपदेश के निष्फलत्वरूप अप्रामाण्य का भी खण्डन हो गया। क्योंकि विद्वानों का यह प्रत्यक्ष अनुभव है। इसी प्रकार तृतीय प्रकार के अप्रामाण्य का भी अनुभवविरोध होने से खण्डन करते हैं। क्योंकि 'तत्त्वमसि' आदि वाक्य के अर्थ में किसी प्रकार का और कभी भी (तीनों कालों में) संशय नहीं है। अतः इसका संशयलक्षण अप्रामाण्य भी नहीं कहा जा सकता ॥ १०३ ॥

प्रतिबन्धविहीनत्वात्स्वयं चानुभवात्मनः। जायेतैव प्रमा तत्र स्वात्मन्येव न संशयः ॥१०४॥

प्रतिबन्धेति—किञ्च पदार्थों के अज्ञान रूप प्रतिबन्ध के न रहने से तथा स्वयं ज्ञान रूप होने के कारण आत्मा में तत्त्वज्ञान की उत्पत्ति भी हो जाती है, इस विषय में भी संशय नहीं है ॥ १०४ ॥

हृदयस्पर्शिनी

पदार्थ का अज्ञान ही, वाक्यार्थज्ञान के होने में प्रतिबन्धक हुआ करता है। पदार्थ का अज्ञान न रहने पर अर्थात् पद-पदार्थ का ज्ञान प्राप्त किये हुए पुरुष को वाक्यश्रवणकाल में ही आत्मविषयक प्रमाज्ञान (यथार्थ ज्ञान) हो ही जाता है, इसमें किञ्चिन्मात्र भी संशय नहीं है। अतः वाक्यार्थोपदेशमात्र से तत्त्वज्ञान की उत्पत्ति होगी या नहीं, ऐसा संदेह नहीं करना चाहिये। उस कारण 'हुँ फट्' आदि शब्द की तरह अनुपत्तिलक्षण अप्रामाण्य भी नहीं कहा जा सकता ॥ १०४॥

किं सदेवाह्मस्मीति किंवाऽन्यत्प्र तिपद्यते। सदेव चेदहंशब्दः सता मुख्यार्थ इष्यताम् ॥१०५॥

किमिति—'तत्त्वमसि' वाक्य के अर्थ को सुनकर 'मैं सत् ही हूँ'यह ज्ञान हो होता है, अथवा अन्य कोई ज्ञान होता है ? यदि 'अहम्' शब्द 'सत्' से भिन्न नहीं है, तो 'सत्' के साथ ही उसका मुख्यार्थ जानना चाहिये ॥ १०५ ॥