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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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२२२ उपदेशसाहस्री कूटस्थे इति—जिस प्रकार सेना के जय-पराजय का राजा पर आरोप किया जाता है, उसी प्रकार अन्तः- करण की 'अहम्' इत्याकारिका वृत्ति और चिदाभास 'अनात्मरूप' (जड़) होने से कूटस्थ आत्मा में ही फल समझना चाहिये ॥ १०८ ॥ हृदयस्पर्शिनी व्यापारशून्य का भी फल के साथ संबंध होने में दृष्टान्त बता रहे हैं। जिस प्रकार सेना के जय- पराजय का राजा पर आरोप किया जाता है, उसी प्रकार अन्तःकरण की अहमात्मिका वृत्ति और चिदाभास, ये दोनों अनात्मभूत जड़ होने के कारण कूटस्थ आत्मा में फल का संबंध समझना चाहिये। यहाँ यह शंका हो सकती है कि दृष्टान्त में तो स्व-स्वामिभावसम्बन्ध निमित्त हो सकता है, किन्तु प्रकृत में अध्यक्ष और अध्यक्ष्य में वैसा सम्बन्ध न दिखाई देने से उपर्युक्त दृष्टान्त कैसे संगत हो सकेगा ? उक्त शंका के समाधान में कहा गया है कि यहाँ भी अधिष्ठान-अधिष्ठेयभावरूप सम्बन्ध, फलसम्बन्ध होने में हेतु हो सकता है। मूल में उक्त 'हेतुभ्यां' को 'हेतुत्वाभ्यां' ऐसा भावप्रधान समझना चाहिये । उसी तरह 'क्रिया' को 'अहमात्मिका वृत्ति' समझनी चाहिये । और 'प्रत्यय' शब्द से 'प्रत्यर्थमयति' इस व्युत्पत्ति के अनुसार 'अन्तःकरणसाभास' अर्थात् वृत्ति और वृत्तिमान् का साभास समझना चाहिए । उसी तरह आत्मत्वं च हेतुत्वं च आत्महेतुत्वे, तस्य = फलस्य न आत्महेतुत्वे, तदनात्मत्वहेतुत्वे ताभ्यां तदनात्मत्वहेतुत्वाभ्याम् । तथाच जड़भूत क्रिया और प्रत्यय, दोनों फलस्वरूप न होने से और फल के उपादन भी न होने से तद्व्यापारनिबन्धन फल, उसके अधिष्ठानरूप कूटस्थ के निर्व्यापार रहने पर भी उसी में होगा। अतः दृष्टान्त यहाँ पर संगत हो जाता है ॥ १०८॥ आदर्शस्तु यदाभासो मुखाकारः स एव सः । यथैवं प्रत्ययादर्शो यदाभासस्तदा ह्यहम् ॥१०९॥ आदर्श इति—आदर्श (दर्पण) जिसके आभास से युक्त होता है, उसी का आकार भी प्रतीत होता है। जैसे जब दर्पण, मुख के आभास से युक्त होता है, तब उसमें ग्रीवास्थ मुख का आकार भी प्रतीत होता है, उसी प्रकार अहंकार जिस चेतन के प्रतिबिम्ब द्वारा प्रकाशित होता है, वह 'परमात्मा' ही है। अतः 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यों का फल चिदात्मा में होना योग्य ही है ॥ १०९ ॥ हृदयस्पर्शिनी शुद्ध आत्मा में प्रमातृत्व नहीं होने से ही यह कहा गया कि कूटस्थ में विशिष्ट प्रमातृकृत फल का उपचार किया जाता है। यह बात राजा के दृष्टान्त से बताई गई है। वस्तुतः स्वात्मा में अध्यस्त स्वोपाधि के व्यापार से चित्प्रतिबिम्ब में ही प्रमातृत्व रहता है। अतः प्रतिबिम्बभावनिबन्धन फलसम्बन्ध अविकृत चिदात्मा से ही होता है। इसे दृष्टान्त देकर बता रहे हैं—जैसे आदर्श (दर्पण) जिस मुख के आभास से विशिष्ट हुआ प्रतीत होता है, वही ग्रीवास्थ मुख का आकार भी होता है, उसी प्रकार अहंकार जिस चेतन के प्रतिबिम्ब द्वारा प्रकाशित है, वह परमात्मा ही है। अतः 'तत्त्वमसि' इत्यादि महावाक्यों का फल चिदात्मा में होना उचित ही है ॥ १०९ ॥ इत्येवं प्रतिपत्तिः स्यात्सदस्मीति च नान्यथा । तत्त्वमित्युपदेशोऽपि द्वाराभावादनर्थकः ॥११०॥ इतीति—चिदाभास का जब स्वीकार करते हैं, तभी 'मैं सत्स्वरूप हूँ'—यह ज्ञान होना संभव हो सकता है, अन्यथा नहीं । चिदाभास के स्वीकार न करने पर कोई रहेगा ही नहीं, तब 'तू सत्स्वरूप है'—यह उपदेश ही व्यर्थ हो जायगा ॥ ११० ॥ हृदयस्पर्शिनी इस रीति से चिदाभास का स्वीकार करने पर ही 'मैं सत्स्वरूप हूँ' यह ज्ञान हो सकता है, अन्यथा नहीं हो सकता । क्योंकि आभास को न मानने पर किसी के न रहने से 'तू सत्स्वरूप है' यह उपदेश भी व्यर्थ हो जायगा ॥ ११० ॥