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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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तत्त्वमसिप्रकरणम् २२७ प्रथनं ग्रहणं सिद्धिः प्रत्ययानामिहाऽन्यतः । आपरोक्ष्यात्तदेवोक्तमनुमानं प्रदीपवत् ॥१२३॥ प्रथनमिति—व्यवहार दशा में प्रत्ययों की स्फूर्ति, ग्रहण और स्थिति, किसी अन्य अपरोक्ष स्वभाव वस्तु के कारण होती हैं। इस विषय में दीपक के समान कहकर अनुमान प्रमाण बताया गया है ॥ १२३ ॥ हृदयस्पर्शिनी ग्राह्य, ग्रहण और ग्राहक से अतिरिक्त आत्मा की सिद्धि में क्या प्रमाण है ? इस प्रश्न के उत्तर में कहते हैं कि जाग्रत्, स्वप्न अवस्थाओं के विषयाकार प्रत्ययों का स्फुरण (प्रथन) है। और ग्रहण का अर्थ है उपादान या स्थिति अथवा व्यवहार तथा सिद्धि का अर्थ है स्वरूपलाभ । ये तीनों तभी हो पाते हैं, जब कोई अन्य अपरोक्षस्वभाव वस्तु कारण हो । जिस प्रकार घट-पटादि पदार्थ दीपक के प्रकाश से प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार जड़ होने के कारण बुद्धि की वृत्तियाँ भी किसी स्वयंप्रकाश वस्तु से प्रकाशित होनी चाहिये। जिससे वे प्रकाशित होती हैं, वही स्वयंप्रकाश आत्मा है। समस्त प्रत्यय उसीमें अध्यस्त हैं और उसी के अधीन उनकी सत्ता भी है। आत्मातिरिक्त समस्त वस्तु आगमापायी होने से अचित्स्वभाव है। यह बात अनुमान-प्रमाण से सिद्ध हो रही है। अनुमान का आकार इस प्रकार होगा— “विमताः प्रत्ययाः स्वविलक्षणानाधीनप्रथनग्रहणसिद्धिकाः अचित्स्वभावत्वात् प्रदीपवत् ।” इस प्रकार तो सामान्य दृष्टांतनुमान से “अत्रायं पुरुषः स्वयं ज्योतिः१”, “आत्मैवास्य ज्योतिः२”, तस्य भासा सर्वमिदं विभाति३” इत्यादि श्रुतियों में प्रसिद्ध स्वप्रकाश आत्मा की संभावना सिद्ध होती है ॥ १२३ ॥ किमन्यद्ग्राहयेत्कश्चित् प्रमाणेन तु केनचित् । विनैव तु प्रमाणेन निवृत्त्याऽन्यस्य शेषतः ॥१२४॥ किमिति—वह वादी समस्त अनात्म (जड़) पदार्थों का प्रतिषेध करके अवशिष्ट के रूप में आत्मा का ग्रहण करता है, तो वह किसी प्रमाण के द्वारा करता है अथवा किसी प्रमाण के विना ही करता है ? ॥ १२४ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार अनुमान प्रमाण द्वारा विधिमुख से आत्मा की सिद्धि बतायी है। अब जो लोग निषेधमुख से ही प्रमाण के द्वारा आत्मा की सिद्धि कहते हैं, विधिमुख से नहीं, उनके मत के निराकरणार्थ विकल्प प्रस्तुत कर रहे हैं— मूल में प्रथम 'तु' शब्द 'एव' के अर्थ में है और द्वितीय 'तु' शब्द 'वा' के अर्थ में है। क्या निषेधमुखवादी अनात्म पदार्थों का निषेध करके अवशिष्टरूप से आत्मा का ग्रहण किसी प्रमाण के द्वारा कराता है, अथवा किसी प्रमाण के बिना ही अर्थात् अन्य की निवृत्ति होने के कारण परिशेषात् ही आत्मा की सिद्धि करता है ? ॥ १२४ ॥ शब्देनैव प्रमाणेन निवृत्तिश्चेदिहोच्यते । अध्यक्षस्या*प्रसिद्धत्वाच्छून्यतैव प्रसज्यते ॥१२५॥ शब्देनैवेति—यदि केवल शब्द प्रमाण से ही अनात्म (जड़) वस्तु का प्रतिषेध कहते हैं तो साक्षी की प्रसिद्धि न होने से शून्यता की ही प्रसक्ति होती है ॥ १२५ ॥ हृदयस्पर्शिनी विधिमुख से ही प्रमाण की प्रवृत्ति होती है, इस प्रथम पक्ष के स्वीकार करने पर इष्टहानि स्पष्ट ही है, अतः द्वितीय पक्ष को लेकर कहते हैं—यदि केवल शब्दप्रमाण से ही अनात्म वस्तु की निवृत्ति (निषेध) कही जा १. ( बृ. उ. ४।३।९ ) २. ( बृ. उ. ४।३।६ ) ३. ( कठ. उ. ५।१५, श्वे. उ. ६।१४, मुं. उ. २।२।१० )

  • प्रसिद्धित्वा ०— पाठान्तरम् ।