BharatKosha
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

Page 269 of 364

Read in context
Page 269

तत्त्वमसिप्रकरणम् २४३ लेकिन वह स्वयं को गिनना भूल जाता था, अर्थात् केवल नौ लोगों को ही गिनता था। तब वे यह समझने लगे कि हम दस में से एक बह गया या डूब गया, और शोकग्रस्त होकर रोने लगे। उसी समय एक बुद्धिमान् आदमी वहाँ आ पहुँचा। और उसने दस में से एक के डूबने का समाचार उनसे सुना, तब उसने कहा 'दशम' दसवाँ भी है, वह न डूबा है और न बह गया है। और दसों को गिनकर यह भी दिखा दिया कि वह 'दशम' दसवा आदमी, स्वयं गणना करने- वाला ही है। अतः जिस प्रकार 'दशमस्त्वमसि' दसवा तू ही है—इस वाक्य का तात्पर्य स्वयं गणना करनेवाले में ही है, उसी प्रकार 'तू ब्रह्म है' इस वाक्य का तात्पर्य भी प्रत्यगात्मा में ही है। 'तत्त्वमसि' वाक्य का तात्पर्य 'दशमस्त्वमसि' वाक्य के समान प्रत्यगात्मा में ही है ॥ १७२ ॥ स्वार्थस्य ह्यप्रहाणेन विशिष्टार्थसमर्पकौ । प्रत्यगात्मावगत्यन्तौ नान्योऽर्थोऽर्थाद्विरोध्यतः ॥१७३॥ स्वार्थस्येति—अपने वाच्यार्थ का त्याग न करने से तो ये विशिष्ट अर्थ के द्योतक होते हैं। किन्तु अन्ततोगत्वा इनका पर्यवसान ( तात्पर्य) प्रत्यगात्मा में ही होता है। इस अखण्डार्थ का विरोधी अन्य अर्थ, वेदान्त शास्त्र में नहीं बताया गया है। 'त्वम्' पद से वाच्य जो 'जीव' है, वह प्रत्यक्ष और अल्पज्ञ है। तथा 'तत्' पद से वाच्य जो 'ईश्वर' है, वह परोक्ष और सर्वज्ञ है। उनके इन विशेष गुणों का बाध कर देने पर 'शुद्ध' चेतन अवशिष्ट रह जाता है। वही 'तत्त्वमसि' महा- वाक्य का अखण्ड अर्थ है ॥ १७३ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'तत्' और 'त्वम्' पदों का यदि एक ही अर्थ में पर्यवसान होता है तो घट-कलश आदि के समान उन्हें पर्याय कहना होगा, तब उनका सहप्रयोग (एकसाथ प्रयोग) नहीं किया जा सकता। ऐसी शंका नहीं करनी चाहिये, क्योंकि उन दोनों की प्रवृत्ति के भिन्न-भिन्न निमित्त (प्रवृत्तिनिमित्त भेद) होने से उन्हें पर्याय नहीं कह सकते। ये 'तत् और त्वम्' दोनों पद, अपने वाच्यार्थ (परोक्षत्व और प्रत्यक्षत्व) का त्याग न करने के कारण ही विशिष्ट अर्थ के प्रकाशक होते हैं। अतः वाच्यार्थ के भिन्न होने से दोनों को पर्याय नहीं कह सकते। अन्ततोगत्वा उन दोनों का तात्पर्य प्रत्यगात्मा में ही है। अर्थात् शुद्ध साक्षी का ज्ञान कराने में ही उन पदों का तात्पर्य है। निष्कर्ष यह है कि तत्-त्वम् पदों के सुनाई देनेवाले सामानाधिकरण्य का तात्पर्य परस्परविरुद्ध वाच्यार्थों के संसर्ग (संबन्ध) में अथवा अन्यतरविशिष्ट हुए अन्यतर में हैं। किन्तु—'सोऽयं देवदत्तः' के समान भेदपरामर्श के कल्पित होने से लक्षण के द्वारा परोक्षत्व-अपरोक्षत्वादि अंश के समाप्त होने पर अखण्डस्वरूपमात्र में उनका पर्यवसान होता है। एवंच प्रत्यगात्मा का ज्ञान कराने के लिये ही तत्-त्वं शब्द कहे गये हैं। तथापि पुनः जिज्ञासा होती है कि तत्-त्वम् पदों के सामानाधिकरण्य की उपपत्ति अंशांशिभाव को मानकर भी हो सकती है, तब अखण्डार्थ में ही इतना पक्षपात क्यों है ? उत्तर यह है कि अखण्डार्थ का विरोधी कोई अन्य अर्थ वेदान्त में नहीं बताया गया है। कहने का अभिप्राय यह है कि सुवर्ण-कुण्डल के समान तत्-त्वम् के अर्थों में कार्य-कारणभाव से संसर्ग का होना संभव नहीं है। क्योंकि “अन्यत्रास्मात्कृताकृतात्”१ श्रुति से विरोध होगा। और भूमि-ऊषरादि के सामान अंशांशिभाव से भी उनका संसर्ग होना संभव नहीं है, क्योंकि “निष्कलं निष्क्रियम्”२ इत्यादि कूटस्थ एकरस की प्रतिपादक श्रुति से विरोध होगा। उसी तरह 'नीलम्-उत्पलम्' में जैसे गुण-गुणिभाव से संसर्ग होता है, वैसा संपर्क भी यहाँ नहीं हो सकता, क्योंकि निर्गुणत्वश्रुति से विरोध होगा। और जाति-व्यक्ति-विशिष्ट स्वरूपादि प्रकार से भी यहां संसर्ग नहीं बन सकता, क्योंकि “एकमेवाद्वितीयम्”३, “असङ्गोहायं पुरुषः४” इत्यादि श्रुतियों से विरोध होगा। तस्मात् विशिष्टसंसर्गविरोधी वस्तुमात्र में स्थित रहना, यही वाक्य की अखण्डार्थता का तात्पर्य है। तथाच अनुमान का आकार यह होगा— १. ( कठ उ. २।१४ ) २. ( श्वे. उ. ६।१९ ) ३. ( छां. उ. ६।२।१८ ) ४. ( बृ. उ. ४।३।१५-१६ )