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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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२५४ उपदेशसाहस्री सकाम इति—इस पर पूर्वपक्षी का कहना है कि यदि गुरुपदिष्ट वाक्य के श्रवण मात्र से ही दुःखरहित आत्मा का साक्षात्कार हो जाता है, तो आप ही बताइये कि सकामत्वादि से विपरीत स्वभाववाले मुझको 'मैं सकाम, सक्रिय और असिद्ध हूँ'—यह अनुभव क्यों होता है ? ॥ २१५ ॥ हृदयस्पर्शिनी इसपर पूर्वपक्षी कहता है कि यदि वाक्यश्रवणमात्र से ही निर्दुःखादिरूप आत्मा का साक्षात्कार हो जाता है, तो बताओ कि सकामत्वादि से विपरीत स्वभाववाले मुझ ब्रह्मरूप हुए को 'मैं सकाम, सक्रिय और असिद्ध हूँ'— ऐसा अनुभव क्यों होता है ? ॥ २१५ ॥ इहैव घटते प्रश्नो न मुक्तत्वानुभूतये । प्रमाणेन विरोधी यः सोऽत्रार्थः प्रश्नमर्हति ॥२१६॥ इहैवेति—उस पर सिद्धान्ती का कहना है कि 'मैं अपने स्वभाव से अन्य स्वभाव वाला कैसे लगता हूँ ?' इस प्रकार का प्रश्न तो हो सकता है, तथापि 'मुक्तत्व' की अनुभूति के सम्बन्ध में कोई प्रश्न नहीं पैदा होता । क्योंकि जो वस्तु प्रमाणविरुद्ध होती है, उसी के विषय में लोग प्रश्न किया करते हैं ॥ २१६ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस पर सिद्धान्ती कहता है कि 'मैं एक स्वभाव का होते हुए भी अन्य स्वभाव का कैसे जान पड़ता हूँ ?'— इस विषय में तो प्रश्न हो सकता है । किन्तु मुक्तत्व की अनुभूति के विषय में कोई प्रश्न नहीं हो सकता, क्योंकि जो वस्तु प्रमाण से विरुद्ध होती है, उसी के विषय में प्रश्न किया जा सकता है ॥ २१६ ॥ अहं निर्मुक्त इत्येव सदसीत्यन्यमानजः । प्रत्यक्षाभासजन्यत्वादुःखित्वं प्रश्नमर्हति ॥२१७॥ अहमिति—'मैं मुक्त हूँ', तथा 'तू सत् है'—यह ज्ञान श्रुतिप्रमाण से हुआ है । किन्तु 'मैं दुःखी हूँ' यह ज्ञान प्रत्यक्ष प्रमाणाभास से उत्पन्न होता है। अतः दुःखित्व के विषय में तो प्रश्न किया जा सकता है ॥ २१७ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'प्रमाण' का स्वभाव तो अज्ञात का ज्ञापन करना है । ऐसे प्रमाण के द्वारा अपूर्वार्थ बोधित होने पर तद्विरोधी अर्थात् प्रमाणाभास के द्वारा गृहीत जो अर्थ है, उसके विषय में प्रश्न किया जा सकता है । 'मैं मुक्तस्वरूप हूँ' यह ज्ञान तथा 'तू सत् है' यह ज्ञान, अन्य प्रमाण (श्रुतिप्रमाण) से होता है। और दुःखित्व आदि का ज्ञान, प्रत्यक्षा- भास से होता है। अतः दुःखित्वादि के विषय में प्रश्न किया जा सकता है ॥ २१७ ॥ पृष्टमाकाङ्क्षितं वाच्यं दुःखाभावमभीप्सितम् ॥२१८॥ पृष्टमिति—अभिलषित ( अभीप्सित ) विषय का ही प्रश्न किया जाता है । अभिलषित विषय (वस्तु) क्या है ? यह पूछने पर यही कहा जायगा कि सबको अभिलषित वस्तु एक ही है, जिसे 'दुःखाभावरूप ब्रह्म' कहते हैं ॥ २१८ ॥ हृदयस्पर्शिनी शिष्य की आकांक्षा को देखते हुए भी कार्य की कल्पना करना उचित प्रतीत नहीं हो रही है । जिस वस्तु के विषय में प्रश्न किया जाता है, उसे अभिलषित कहते हैं । शिष्य की आकांक्षित क्या है ? तो कहना होगा कि उसे 'दुःखाभाव' ही अभिलषित ( आकांक्षित ) है । दुःख का अभाव है जिसमें, ऐसा दुःखाभाव, ब्रह्मरूप (मोक्षस्वरूप) ही है ॥ २१८ ॥ कथं हीदं निवर्तेत दुःखं सर्वात्मना मम । इति प्रश्नानुरूपं यद्वाच्यं दुःखनिवर्तकम् ॥२१९॥