उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
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Read in context२५६ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी "शान्तो१ दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वात्मन्येवात्मानं पश्यति" ऐसी श्रुति होने के कारण 'त्वं' पद के अर्थ का विवेक करने के लिए समस्त कर्मों का त्याग, साधन बन जाता है। अतः वह अशास्त्रसंवेद्य नहीं है, जिससे उसका परित्याग नहीं किया जा सकता। तथाच, पदार्थाज्ञान से पूर्व वाक्यार्थज्ञान होने से पदार्थावधारण तक आश्रमधर्मों का विधिपूर्वक अनुष्ठान करना ही होगा। उसके पश्चात् वेदान्तवाक्य से ब्रह्मात्मतत्त्व का ज्ञान हो जाने पर 'मया इदं अस्मै कर्तव्यम्' इस प्रकार नियोज्य विषय का ज्ञान न होने से उस व्यक्ति के लिये कहीं भी विधि में प्रवृत्ति नहीं होगी। किन्तु साधक अवस्था में ज्ञान के अविरुद्ध निवृत्तिरूप आश्रमधर्म का अभ्यास रहने के कारण संस्कारमात्र शेष रहने से अनुवृत्तिमात्र होती रहती है, उस कारण यथेष्टाचरण के लिए कोई अवकाश नहीं है। अतः सिद्धान्ती के मत में कोई किसी प्रकार का दोष नहीं है ॥ २२२ ॥ त्वमर्थं प्रत्यगात्मानं पश्येदात्मानमात्मनि । वाक्यार्थं तत आत्मानं सर्वं पश्यति केवलम् ॥२२३॥ त्वमर्थमिति—शम-दमादि साधनसम्पत्ति से सम्पन्न पुरुष, 'त्वम्' पद के अर्थभूत 'प्रत्यगात्मा' को अपने अन्तः- करण में ही देखने का अभ्यास करता रहे। ऐसा अभ्यास करने से कालान्तर में वह सर्वत्र सभी को वाक्यार्थभूत 'शुद्ध आत्मा' के रूप में देखने लगता है ॥ २२३ ॥ हृदयस्पर्शिनी उपर्युक्त कथन का ही विस्तार करते हुए श्रौत वाक्यार्थज्ञान की उत्पत्ति के प्रकार को बता रहे हैं। शम, दम, उपरति, तितिक्षा, समाधान और श्रद्धा से सम्पन्न होकर जिज्ञासु व्यक्ति आत्माभास से व्याप्त हुए स्वकार्य-कारण संघात (शरीर) में ही, 'त्वं' पद के अर्थभूत प्रत्यक्चेतयितास्वरूप आत्मा को ही देखता रहे। इस प्रकार शोधित प्रत्यगात्मा को वह सर्वत्र देखने लगता है ॥ २२३ ॥ सर्वमात्मेति वाक्यार्थे विज्ञातेऽस्य प्रमाणतः । असत्त्वे ह्यन्यमानस्य विधिस्तं योजयेत्कथम् ॥२२४॥ सर्वमिति—श्रुति प्रमाण के बल पर 'सब आत्मा ही है'—इस वाक्यार्थ को अच्छी तरह से जान लेने पर अन्य अतिरिक्त प्रमाणों का मिथ्यात्व सिद्ध हो जाता है। तब उन मिथ्याभूत प्रमाणों की कौन-सी विधि उस मुमुक्षु को किसी कर्तव्य में नियुक्त कर सकेगी ? ॥ २२४ ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रमाण के द्वारा 'सब आत्मा ही है'—इस वाक्यार्थ को विशेष रूप से जान लेने पर तथा अन्य प्रमाणों का मिथ्यात्व सिद्ध होनेपर उसे कोई विधिवाक्य किस प्रकार नियोजित कर सकेगा ? क्योंकि विधिविषयता तो भेद में ही होती है। ज्ञानी की भेददृष्टि तो समाप्त हो चुकी है। अतः उसके लिये कोई विधि-निषेध नहीं होते ॥ २२४ ॥ तस्माद्वाक्यार्थविज्ञानान्नोध्वं कर्मविधिर्भवेत् । नहि ब्रह्मास्मि कर्तेति विरुद्धे भवतो धियौ ॥२२५॥ तस्मादिति—श्रुत्युक्त ब्रह्मात्मैक्यप्रतिपादक वाक्य का अर्थ जान लेने पर मुमुक्षु पुरुष के लिये कोई कर्मविधि नहीं रह जाती। क्योंकि 'मैं ब्रह्म हूँ', और 'मैं कर्म का कर्ता हूँ'—ये दोनों ज्ञान परस्पर विपरीत हैं। दो विपरीत बुद्धियां (ज्ञान) एक साथ नहीं रह सकती ॥ २२५ ॥ १. बृ. उ. ४।४।२३—'समाहितः' तथा 'पश्यति'—यह काण्वपाठ है और 'श्रद्धावित्तः', तथा 'पश्येत्'—यह माध्यन्दिनपाठ है।