उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
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Read in context२५८ उपदेशसाहस्री यथेष्टेति—'तत्' और 'त्वम्' पदों के अर्थ का सम्यक् विचार करके जिस मुमुक्षु को बोध (ज्ञान) हुआ है, और जो महावाक्यार्थ का अनुभव करना चाहता है, उसके लिये तो 'संन्यास' आदि का विधान किया गया है। ऐसी स्थिति में उसका स्वेच्छाचार (यथेष्टाचार) हो ही कैसे सकता है ? ॥ २२९ ॥ हृदयस्पर्शिनी विधि-निषेध से रहित होनेपर वह ज्ञानी पुरुष यथेष्ट आचरण करने लगेगा, ऐसी शंका करना उचित नहीं है। क्योंकि जिसे 'तत्' और 'त्वम्' पद का सम्यक् विचार करने से ज्ञान प्राप्त हुआ है, तथा जो वाक्यार्थ का अनुभव करने में लगा हुआ है, उसके लिए संन्यासविधि, श्रवणादि विधि बतायी गयी है। उससे वह देहाभिमान- शून्य हो जाता है। वह तो वाक्यार्थ का अनुभव करने में तत्पर रहता है। अतः उसके लिए यथेष्ट आचरण करने का कोई निमित्त ही नहीं है और अवसर भी नहीं है। उस ज्ञानी में मिथ्याज्ञान का लेश तक नहीं रहता। अतः वह मिथ्याज्ञानमूलक यथेष्टाचरण कैसे करेगा ? ॥ २२९ ॥ अतः सर्वमिदं सिद्धं यत्प्रागस्माभिरीरितम् ॥ २३०॥ अत इति-अतः पूर्व जो कुछ बताया गया है, वह सभी सिद्ध हो गया ॥ २३० ॥ यो हि यस्माद्विरक्तः स्यान्नासौ तस्मै प्रवर्तते । लोकत्रयाद्विरक्तत्वान्मुमुक्षुः किमितीहते ॥ २३१॥ योहीति-जो व्यक्ति, जिस वस्तु से विरक्त हो जाता है, वह पुनः उस वस्तु के प्रति प्रवृत्त नहीं होता । तब जो मुमुक्षु पुरुष तीनों लोकों से विरक्त हो चुका हो, वह किस वस्तु को चाहेगा ? अर्थात् उसे किसी वस्तु की इच्छा नहीं होती ॥ २३१ ॥ हृदयस्पर्शिनी जबकि मुमुक्षु को भी यथेष्ट चेष्टा नहीं किया करता, तब मुक्त पुरुष के यथेष्टाचरण की शंका ही कैसे की जा सकती है ? जो व्यक्ति जिससे विरक्त हो जाता है, उसके प्रति वह पुनः प्रवृत्त नहीं हुआ करता । फिर तीनों लोकों से विरक्त हुआ मुमुक्षु पुरुष किस वस्तु की इच्छा करेगा ? अर्थात् वह सर्वथैव निरिच्छ ही रहेगा ॥ २३१ ॥ क्षुधया पीड्यमानोऽपि न विषं ह्यत्तुमिच्छति । *मृष्टान्नध्वस्ततृड् जानन् नामूढस्तज्जिघत्सति ॥२३२॥ क्षुधयेति-भूख से व्याकुल होने पर भी कोई आदमी विष खाना नहीं चाहता । उसी तरह जिस ज्ञानी पुरुष की भूख (अन्न की इच्छा) सुस्वादु मधुर अन्न से शान्त हो चुकी है, वह पुनः उसे खाने की इच्छा नहीं करता । अर्थात् साधना के समय सभी विषयों में उसने दोष-दर्शन कर लिया है, अतः वह ज्ञानी पुरुष पुनः उन विषयों को कैसे स्वीकार करेगा ? ॥ २३२ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि यह कहें कि विद्वान् ज्ञानी पुरुष यद्यपि नियोग (विधि) के परतन्त्र न भी रहे, तो भी भिक्षाटनादि- प्रवृत्ति की तरह विषयान्तरों में भी उसकी प्रवृत्ति कदाचित् होना संभव है। इस शंका का समाधान यह है कि जितने भी विषय हैं, वे सभी दुःख के साधन हैं, ऐसा जिसका निश्चय हो चुका है, वह उन्हें विष की तरह त्याग देता है, अतः वह उन्हें पुनः ग्रहण नहीं करता। भिक्षाटनादि की जो प्रवृत्तियाँ हैं, वे ज्ञाननिष्ठा की विरोधी नहीं हैं। वे तो केवल शरीरस्थिति मात्र की साधनरूपा हैं, इसलिए वे आवश्यक हैं। उनसे कोई अपूर्वोपचय नहीं होता । अर्थात् जो पुरुष क्षुधा से पीड़ित (व्याकुल) है, वह भी विषभक्षण करना नहीं चाहता। तब जिसकी इच्छा मधुर अन्न से तृप्त हो चुकी है, वह ज्ञानी पुरुष उसे खाने की इच्छा कभी कर ही नहीं सकता। संस्कारवशात् भिक्षाटनादि प्रवृत्ति की अनुवृत्तिमात्र होती है ॥ २३२ ॥
- मिष्टान्न—पाठान्तरम् ।