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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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उपदेशसाहस्री (गद्यभागः) शिष्यानुशासनप्रकरणम् अथ मोक्षसाधनो*पदेशविधिं व्याख्यास्यामो मुमुक्षूणां श्रद्दधानानामर्थिनामर्थाय ॥१॥ हृदयस्पर्शिनी अथेति—समस्त उपनिषदों के सारभूत अर्थ की संग्राहिका पद्य-गद्यात्मक इस उपदेशसाहस्री की रचना भगवत्पूज्यपाद भगवान् भाष्यकार (आद्य श्रीशङ्कराचार्य) ने की है ! प्रथमतः पद्यभाग को समाप्त कर गद्यभाग का आरम्भ तथा निर्विघ्नतया ग्रन्थ की परिसमाप्ति एवं लोककल्याणार्थ उसके प्रचार-प्रसार की कामना से प्रमाणभूत स्मृति के अनुसार भाष्यकार ने 'अथ' शब्द से ही मङ्गलाचरण करते हुए ग्रन्थ का आरंभ किया है। “ॐकारश्चाथशब्दश्च द्वावेतौ ब्रह्मणः पुरा। कण्ठं भित्त्वा विनिर्यांतौ तस्मान्माङ्गलिकावुभौ ॥” इस स्मृतिवचन के अनुसार 'अथ' शब्द को माङ्गलिक माना जाता है। अमरकोषकार ने 'अथ' के अनेक अर्थ बताये हैं। उन अनेक अर्थों में एक अर्थ 'अनन्तर' भी है। तदनुसार उसे आनन्तर्यार्थक स्वीकार करने पर भी उसके उच्चारण मात्र से ही मङ्गलाचरण अन्यार्थ क्रियमाण मृदङ्गादि ध्वनिश्रवण के समान अनायास सिद्ध हो जाता है। आनन्तर्यार्थक 'अथ' शब्द के द्वारा यह ज्ञात होता है कि अनेक शास्त्रार्थ-निबन्धों का सविस्तार निर्माण करने के अनन्तर अर्थात् इस ग्रन्थ के पूर्व आचार्यचरणों ने समस्त दशोपनिषद तथा अन्यान्य उपनिषदों पर भी प्रश्न, प्रतिवचन, आक्षेप, समाधान आदि की शैली से अनेक प्रमाण तथा युक्तिपुरःसर भाष्यरचना की और उसके द्वारा समस्त उपनिषदों के अर्थ का निर्धारण कर दिया, तथापि अधिकारियों के तारतम्य को देखकर अनेक वाक्य, युक्तियों के अनुसन्धान के व्यवधान को हटाकर साक्षात् औपनिषद ज्ञान कराने के लिये उसी उपनिषदर्थ का संक्षेप में निरूपण करने की ओर आचार्यचरण प्रवृत्त हो रहे हैं। संक्षेप में उपनिषदर्थप्रतिपादक इस उपदेशसाहस्री के द्वारा सरलता से परमार्थ-तत्त्व का ज्ञान हो सकता है। अपने चिकीर्षित अभीष्ट ग्रन्थ की प्रतिज्ञा करते हुए ग्रन्थप्रवृत्ति में उपकारक शास्त्रीय अनुबन्धों का संग्रह प्रारंभ में किया हुआ है। भाष्यकार “अथ मोक्षसाधनोपदेशविधि व्याख्यास्यामः, मुमुक्षूणां श्रद्दधानानामर्थिना- मर्थाय” ॥ १॥ इस वाक्य के द्वारा ग्रन्थारम्भ की प्रतिज्ञा कर रहे हैं और तद्गर्भित अनुबन्धचतुष्टय की सूचना भी दे रहे हैं। ग्रन्थगत 'मोक्ष' शब्द से 'प्रत्यक्तत्त्व ब्रह्म' रूप विषय का निर्देश किया है। 'साधन' (तत्त्वज्ञान) शब्द से तत्साध्य अज्ञानादिबन्ध की निवृत्तिरूप प्रयोजन को सूचित किया है। 'उपदेशविधि' शब्द से शास्त्र और विषय के 'बोध्य-बोधक सम्बन्ध' को प्रदर्शित किया गया है। 'मुमुक्षु' शब्द से केवल मोक्ष की ही इच्छा रखने वाले भाग्यशाली इसके अधिकारी— इस प्रकार अनुबन्धचतुष्टय सूचित किया गया है। श्रीमदाचार्यचरण प्रतिज्ञा कर रहे हैं—हम सविस्तर शास्त्रार्थ निरूपण के अनन्तर निष्प्रपञ्च ब्रह्मात्मकताविर्भाव के साधनभूत अद्वितीय उपनिषत्प्रोक्त आत्मतत्त्वज्ञान की उपदेशविधि को स्पष्ट रूप से बतावेंगे। उपनिषदवाक्यों का अर्थविभाग करते हुए मुमुक्षु शिष्य के प्रति प्रतिपादन करना ही 'उपदेश' है। आचार्य ने अधिकारी के तीन विशेषणों से शिष्य की साधन सम्पत्ति को बता दिया है। अधिकारी शिष्य वही होता है, जो मुमुक्षु हो, श्रद्धा रखनेवाला (श्रद्दधान) हो, और अर्थी हो । प्रथम विशेषण से यह सूचित किया है कि ऐहलौकिक तथा पारलौकिक अर्थ की तृष्णा का लव-लेश भी जिनमें हो, वे इस वेदान्तश्रवण के अधिकारी नहीं हैं। दूसरे विशेषण से यह सूचित किया है कि मुमुक्षु रहते हुए भी यदि कर्मानुष्ठान में तत्पर हों या

  • साधनज्ञानो०—पाठान्तरम् । ३५