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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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शिष्यानुशासनप्रकरणम् २८३ हृदयस्पर्शिनी आचार्य इति—यह सुनकर आचार्य शिष्य से कहे कि तुमने बहुत ठीक कहा, तुम्हारी दृष्टि ठीक है, तो तुमने असत्य क्यों कहा था कि मैं ब्राह्मण पुत्र था, अमुक गोत्र में उत्पन्न ब्रह्मचारी अथवा गृहस्थ था और अब परमहंस परिव्राजक हो गया हूँ ॥ १३ ॥ स यदि ब्रूयात् — भगवन् कथमहं मृषाऽवादिषमिति ॥१४॥ हृदयस्पर्शिनी यदि शिष्य गुरु से यह कहे कि भगवन् ! स यदीति—मैने असत्य क्या कहा था ? तो आचार्य उससे इस प्रकार कहे... ॥ १४ ॥ तं प्रति ब्रूयादाचार्यः—यतस्त्वं भिन्नजात्यन्वयसंस्कारं शरीरं जात्यन्वयसंस्कारवर्जितस्यात्मनः प्रत्यभ्यज्ञासीर्ब्राह्मणपुत्रोऽदोऽन्वय* इत्यादिना वाक्येनेति ॥१५॥ हृदयस्पर्शिनी तं प्रतीति—क्योंकि तुमने 'मैं अमुक गोत्र में उत्पन्न हुआ ब्राह्मण पुत्र था' इत्यादि वाक्य से भिन्न अनात्मभूत जाति-कुल-संस्कार वाले शरीर की जाति और कुल से रहित आत्मा के स्थान में प्रत्यभिज्ञा की थी, इसलिये तुम्हारा कथन असत्य था ॥ १५ ॥ स यदि पृच्छेत्— कथं भिन्नजात्यन्वयसंस्कारं शरीरं, कथं वा अहं जात्यन्वयसंस्कारवर्जितः ? इति ॥१६॥ हृदयस्पर्शिनी स यदीति—इस पर यदि वह शिष्य पूछे कि शरीर अनात्मभूत जाति, कुल और संस्कार से किस प्रकार युक्त है और मैं किस प्रकार जाति, कुल और संस्कार से रहित हूँ ॥ १६ ॥ आचार्यो ब्रूयात् — शृणु, सोम्य, यथेदं† शरीरं त्वत्तो भिन्नं भिन्नजात्यन्वयसंस्कारम्, त्वं च जात्यन्वयसंस्कारवर्जितः । इत्युक्त्वा तं स्मारयेत्—स्मर्तुमर्हसि, सोम्य परमात्मानं सर्वात्मानं यथोक्त- लक्षणं श्रावितोऽसि “सदेव सोम्येढं” इत्यादिभिः श्रुतिभिः स्मृतिभिश्च, लक्षणं च तस्य श्रुतिभिः स्मृतिभिश्च ॥१७॥ हृदयस्पर्शिनी आचार्य इति—उसपर आचार्य को कहना चाहिये कि 'हे सोम्य ! जिस प्रकार यह शरीर (देह) तुझसे भिन्न अनात्मभूत जाति, कुल और संस्कार से युक्त है, तथा तू जाति, कुल और संस्कार से शून्य है, उसे सुन !' यह कह कर उसे स्मरण दिलावे कि हे सोम्य ! तुझे जो “सदेव सोम्येदमग्र आसीत्¹”, आदि श्रुति-स्मृति वाक्यों से परमात्मा का श्रवण कराया था, सो तुझे उन लक्षणों से युक्त सबके आत्मस्वरूप परमात्मा को तथा श्रुति और स्मृतियों के अनुसार उसके लक्षण को स्मरण रखना चाहिये। इसी प्रकार “य आत्माऽपहतपाप्मा²” इत्यादि श्रुतिवाक्य तथा “न जायते³” इत्यादि स्मृतिवाक्यों के द्वारा उक्त ब्रह्म के (आत्मा के) लक्षण को याद रखना चाहिये ॥ १७ ॥ १. (छां. उ. ६।२।८) * प्रत्यभिज्ञासी ०—पाठान्तरम् । २. (छां. उ. ८।७।१) † तदेव यथेदं—पाठान्तरम् । ३. (भ. गी. २।२०)