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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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उपोद्घातप्रकरणम् हृदयस्पर्शिनी जिस प्रकार कर्म संसार के कारण हैं उसी प्रकार वे मोक्ष के भी कारण हैं। अतः भोगों का त्याग करनेपर अर्थात् अपने किए हुए कर्म ही संसार की प्राप्ति कराने में निमित्त हैं, उन निमित्तभूत कर्मों के फलों का उपभोग कर चुकने पर उन निमित्तभूत कर्मों का विनाश हो ही जायगा और संसार की निवृत्ति हो जायगी, क्योंकि ‘निमित्ताभावे नैमित्तिकाभावः' यह नियम है। एवंच मोक्ष तो प्रयत्नलभ्य है, उसके लिए ब्रह्मविद्या की कौन आवश्यकता ? किन्तु इस प्रकार की आशंका करना उचित नहीं है। कारण यह है कि कर्म और तत्फलस्वरूप संसारवृक्ष का मूल कारण अज्ञान है। एवंच कर्म अज्ञानकृत है, अतः कर्म के रहते संसार का उपरम नहीं होगा, तब मोक्ष को प्रयत्नलभ्य कैसे कह सकते हैं ? अथवा उक्त शंका का समाधान इस प्रकार भी किया जा सकता है कि अज्ञानी की कर्म करने की प्रवृत्ति कभी न रुक सकने से संसार की समाप्ति (निवृत्ति) तो कभी हो ही नहीं सकती। अपने कृतकर्म के फलभोग के समय में भी कर्मप्रवृत्ति के अवश्य रहने से पुनः फलभोग की धारा निरन्तर चलती ही रहेगी। ऐसी स्थिति में कर्मनिवृत्ति से मोक्ष की सिद्धि अनायास कैसे हो सकती है ? अतः संसार की निवृत्ति (आत्यन्तिक उपरम) के लिए अज्ञान का त्याग करना आवश्यक है, किन्तु उसका (अज्ञान का) त्याग, ब्रह्मज्ञान हुए बिना हो ही नहीं सकता। एवञ्च ब्रह्मज्ञान (ब्रह्मविद्या) से ही अज्ञान की निवृत्ति होने से संसार की निवृत्ति ( निरतिशयानन्दाविर्भावरूप कैवल्य = मोक्ष ) रूप वास्तविक कल्याण का होना सम्भव है ॥ ५ ॥

विद्यैवाऽज्ञानहानाय न कर्माप्रतिकूलतः । नाज्ञानस्याप्रहाणे हि रागद्वेषक्षयो भवेत् ॥ ६ ॥ विद्यैवेति-ज्ञान ही अज्ञान की निवृत्ति कराने में समर्थ है, कर्म नहीं, क्योंकि कर्म का अज्ञान से कोई विरोध नहीं है। और अज्ञान की निवृत्ति (विनाश) के बिना राग-द्वेष का क्षय (अभाव) नहीं हो सकेगा ॥ ६॥ हृदयस्पर्शिनी कतिपय कर्मठ (कर्म में ही नितान्त श्रद्धा रखनेवाले) लोग यह कहते पाये जाते हैं कि कर्मों की अपनी निजी विचित्र शक्ति होती है', उसके बल पर उन कर्मों के द्वारा ही अज्ञान की निवृत्ति भी कर दी जा सकती है, विद्या (ज्ञान) की क्या आवश्यकता ? किन्तु कर्मठों का यह कथन उचित प्रतीत नहीं हो रहा है क्योंकि प्रकाश से अप्रकाश का नष्ट (निवृत्त) होना तो समझ में आता है। विद्या (ज्ञान) प्रकाशात्मक है। अतः वही संसार की मूलभूत अप्रकाशरूप अविद्या और उसके कार्य को नष्ट (निवृत्त) कर सकती है। क्योंकि दोनों में परस्पर विरोध है, किन्तु अज्ञान जैसे अप्रकाशात्मक है वैसे ही कर्म भी अप्रकाशरूप (अप्रकाशात्मक) है, अतः दोनों (अज्ञान और कर्म) में कोई विरोध ही नहीं है, जिससे वह (कर्म) अज्ञान को निवृत्त कर सके। मोक्ष प्राप्ति के लिए विद्या (ब्रह्मविद्या, तत्त्वज्ञान) की आवश्यकता न समझनेवाले लोगों ने अपने पक्ष के समर्थन में जो 'हिरण्यदाः' श्रुति उपस्थित की थी, उसका पर्यवसान (तात्पर्य) आपेक्षिक अमृतत्व में समझना चाहिए। अन्यथा अनुमान २ तथा 'नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय³' इत्यादि श्रुति के साथ विरोध होगा। उसी तरह 'कर्मणैव हि'४ स्मृति का तात्पर्य भी कर्म के द्वारा अज्ञान की निवृत्ति होने में नहीं है। अन्यथा 'न कर्मणा न प्रजया' श्रुति के साथ विरोध होगा।

१. 'हिरण्यदा अमृतत्वं भजन्ते'- [ऋ० सं० ८।६।३।२], 'कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः' - [भ० गी० ३।२०] २. 'रज्ज्वावरणाविद्यातमसो तत्कल्पितसर्पाद्याकारं च रज्जुतत्त्वज्ञान-प्रदीपो निवर्तयतः, स्वभावविरोधात् । कर्म तु नाज्ञानतमोन्निवर्तकं, तदविरोधित्वात्, अप्रकाशात्मकत्वाद्वा, नीहारस्तोमवत् ।' ३. श्वे० उ० ३।८ ४. भ० गी० ३।२