उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
DevanagariSanskritpublished364 pages
Page 324 of 364
Read in contextPage 324
२९८ उपदेशसाहस्री (जिसने कि आरंभ में इच्छा की थी) वाणी को स्त्री, प्राण को पुत्र, चक्षु को मानुषवित्त (गौ आदि) और श्रोत्र को दैव वित्त (विज्ञान) बतलाया है । 'एषणा' तीन प्रकार की होती है। (१) पुत्रैषणा, (२) वित्तैषणा, (३) लोकैषणा । इनमें मानुष और दैव भेद से वित्त दो प्रकार का है और उनसे प्राप्त होनेवाले लोक-इहलोक, पितृलोक, और देवलोक भेद से तीन प्रकार के हैं। मुमुक्षु को इन सभी का त्याग करना चाहिये । ये सब यजमानादि के द्वारा साध्य यज्ञादि कर्म से प्राप्त होते हैं। इसलिये इन्हें 'पाङ्क्त' कहा है ।। ४४ ।। ॥ इति प्रथमं शिष्यानुशासनप्रकरणं समाप्तम् ॥