उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
Page 327 of 364
Read in contextयहाँ पृष्ठ का संपूर्ण पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति दिया गया है:
कूटस्थाऽद्वयात्मबोधप्रकरणं ३०१ विपरीत समझ रहे हो। तथा अकर्ता होते हुए कर्ता, अभोक्ता होते हुए भोक्ता और विद्यमान होते हुए अविद्यमान मानते हो—यही अविद्या है॥५०॥ शिष्य उवाच—यद्यप्यहं विद्यमानः, तथाऽपि न परमात्मा, कर्तृत्वभोक्तृत्वलक्षणः संसारो मम स्वभावः, प्रत्यक्षादिभिः प्रमाणैरनुभूयमानत्वात्—नाविद्यानिमित्तः, अविद्यायाः स्वात्मविषयत्वा- नुपपत्तेः। अविद्या नामान्यस्मिन्नन्यधर्माध्यारोपणा—यथा प्रसिद्धं रजतं प्रसिद्धायां शुक्तिकायाम्, यथा प्रसिद्धं पुरुषं स्थाणावध्यारोपयति, प्रसिद्धं वा स्थाणुं पुरुषे, नाप्रसिद्धं प्रसिद्धे, प्रसिद्धं वा अप्रसिद्धे। न चात्मन्यनात्मानमध्यारोपयति, आत्मनोऽप्रसिद्धत्वात्; तथाऽऽत्मानमनात्मनि आत्मनोऽप्रसिद्धत्वादेव ॥५१॥ हृदयस्पर्शिनी शिष्य इति—शिष्य ने आत्मा की नित्यता तो स्वीकार कर ली, किन्तु उसके असंसारित्व पर पुनः आक्षेप किया है। अर्थात् अविद्या, मिथ्याज्ञान की कारणभूत है, यह कह चुके हैं। किन्तु शिष्य को यह शंका हो रही है कि मिथ्याज्ञान के अतिरिक्त अविद्या नाम की कोई वस्तु नहीं है। किन्तु संसार के उपादानकारण के रूप में मिथ्या- ज्ञानातिरिक्त अविद्या की सिद्धि हो जाती है। शिष्य बोला—यद्यपि मैं विद्यमान हूँ, तथापि परमात्मा तो नहीं हूँ। कर्तृत्व-भोक्तृत्वरूप संसार मेरा स्वभाव है, क्योंकि प्रत्यक्षादि प्रमाणों से ऐसा ही अनुभव होता है। अर्थात् 'मैं कर्ता हूँ' यह प्रतीति तो प्रत्यक्ष ही है। उसके अतिरिक्त धर्म होने के कारण 'कर्तृत्वादि' तो साश्रय ही होने चाहिये, जैसे रूपादि। उनका आश्रय पाषाणादि अचेतन पदार्थ नहीं हो सकते, क्योंकि उनमें सुख-दुःखादि योग देखने में नहीं आता। अतः वे चेतन के ही आश्रित होने चाहिये। तथाहि—'कर्तृत्व-भोक्तृत्वादिः साश्रयः धर्मत्वात्, रूपादिवत्, इति साश्रयत्वे सिद्धे न अचेतने सुखदुःखम्, पाषाणादौ तददर्शनात्। परिशेषात् चेतनाश्रयत्वसिद्धिः' यह अनुमान से भी सिद्ध हो रहा है। उसी तरह “गुणान्वयो यः फलकर्मकर्ता कृतस्य तस्यैव स चोपभोक्ता”१, “य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः२” इन श्वेताश्वतर और कठ इत्यादि आगमप्रमाणों से भी यही सिद्ध होता है। उपर्युक्त अनुभव, अविद्या के कारण नहीं हो सकता, क्योंकि अविद्या अपने आत्मा को ही विषय नहीं कर सकती। अन्य वस्तु में अन्य वस्तु के धर्मों का आरोप करना ही अविद्या है। जिस प्रकार प्रसिद्ध प्रत्यक्ष प्रमाणसिद्ध रजत का, प्रसिद्ध शुक्ति में, तथा प्रसिद्ध पुरुष का प्रसिद्ध स्थाणु में आरोप किया जाता है। प्रसिद्ध वस्तु में अप्रसिद्ध का तथा अप्रसिद्ध में प्रसिद्ध का आरोप नहीं होता। 'आत्मा' तो लोकप्रसिद्ध नहीं है। इसलिये उसमें कोई अनात्मा का आरोप नहीं कर सकता और न अनात्मा में ही आत्मा का आरोप हो सकता है, क्योंकि आत्मा अप्रसिद्ध है। यदि आत्मा प्रसिद्ध हो तो प्रकाशस्वरूप होने के कारण उसमें अनात्मधर्मों की प्रतीति नहीं हो सकती, और यदि अप्रसिद्ध हो तो उसका स्फुरण ही न होने के कारण उसमें अन्य धर्मों का आरोप कैसे किया जा सकता है? इस प्रकार आत्मा में किसी तरह भी अध्यास का होना संभव नहीं है, अतः कर्तृत्व-भोक्तृत्व तो आत्मा का स्वभाव ही है॥५१॥ तं गुरुरुवाच—न, व्यभिचारात् । न हि, वत्स, प्रसिद्धं प्रसिद्ध एवाध्यारोपयतीति नियन्तुं शक्यम् । आत्मन्यध्यारोपणदर्शनात् । गौरोऽहं, कृष्णोऽहमिति देहधर्मस्याहंप्रत्ययविषये आत्मनि, अहंप्रत्ययविषयस्य च आत्मनः देहेऽयमह मस्मीति ॥५२॥ हृदयस्पर्शिनी तमिति—अधिष्ठान और अध्यस्यमान दोनों पदार्थों की पृथक् प्रसिद्धि के बिना अध्यास का होना अनुपपन्न है, या केवल प्रसिद्धि के बिना? ऐसा विकल्प करने पर अन्तिम पक्ष तो उचित नहीं है, क्योंकि सिद्धिमात्र को तो स्वीकार किया गया है। इस अभिप्राय को ध्यान में रखकर आद्यपक्ष का निराकरण कर रहे हैं। शिष्य के किये हुए प्रश्न का उत्तर गुरु दे रहे हैं। उस शिष्य से गुरु ने कहा—तुमने जो ऊपर नियम का प्रदर्शन किया वह उचित १. (श्वे. उ. ५।७ ) २. (कठ उ. ५।८ )
- याश्चात्म—पाठान्तरम् ।