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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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उपोद्घातप्रकरणम् ७ हृदयस्पर्शिनी छठे श्लोक में यह कहा था कि संसार की उत्पत्ति में कारण अज्ञान है, अतः उसका निवर्तक ज्ञान ही मोक्षप्राप्ति में कारण हो सकता है, कर्म नहीं। उस पर ज्ञान-कर्मसमुच्चयवादी कहता है कि 'वेदान्तवाक्यों के द्वारा विद्या (ज्ञान) को ही मोक्ष का हेतु (कारण) बताया गया है', किन्तु यह कथन उचित नहीं है। क्योंकि जब तक जीवन है, तब तक विद्या (ज्ञान) के समान यावज्जीवश्रुति से विहित नित्य कर्म करने के लिये कहा गया है। यह प्रश्न किया जा सकता है कि मोक्षप्राप्ति में कर्म, स्वतन्त्ररूप से (साक्षात्) कारण नहीं है, इसलिये मोक्ष में कर्म का उपयोग न होने से नित्य कर्म करने की क्या आवश्यकता है ? अर्थात् कोई आवश्यकता नहीं है। मोक्ष में कर्म को तभी कारण कह सकते हैं कि जब ज्ञान के साथ उसका समुच्चय कहा जाय। अतः ज्ञान-कर्मसमुच्चय को मोक्षप्राप्ति में कारण कहना चाहिये, केवल ज्ञान को नहीं। समुच्चयवादी अपने मत के समर्थन में प्रमाण उपस्थित करता है— "न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् । कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः १" ॥ यह स्मृति कहती है कि प्रकृति-परतन्त्र जीवित पुरुष को विद्या की तरह कर्म करना ही चाहिये। उसी तरह “यावज्जीव- मग्निहोत्रं जुहुयात्” इस श्रुति ने भी नित्य कर्म अवश्य करते रहने के लिये कहा है। इन श्रुति-स्मृतियों के वाक्यों को देखने से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि मोक्ष के प्रति कारणभूत विद्या के सहकारी के रूप में (इतिकर्तव्यता के रूप में) कर्म भी कारण (सहकारी कारण) है। अतः मुमुक्षु को भी कर्म करते रहना चाहिये, क्योंकि “विद्ययाऽमृतमश्नुते” इसमें ‘विद्यया' इस तृतीया विभक्ति के द्वारा ‘ज्ञान' मोक्ष के प्रति कारण (साधन) है, यह अवगत कराया गया है। ‘कारण' को इतिकर्तव्यता की अपेक्षा (आवश्यकता) हुआ करती है। कर्म के अतिरिक्त कोई अन्य इतिकर्तव्य यहाँ नहीं है। इसलिये फलोपकारी प्रयाजादि अंगों का दर्शादि प्रधान कर्म के साथ समुच्चय जैसे स्वीकार किया जाता है, वैसे ही कर्म के साथ ज्ञान का भी समुच्चय स्वीकार करना चाहिये ॥ ८ ॥ यथा विद्या तथा कर्म चोदितत्वाविशेषतः । प्रत्यवायस्मृतेश्चैव कार्यं कर्म मुमुक्षुभिः ॥ ९ ॥ यथेति—शास्त्रों में कर्म और ज्ञान का विधान समान रूप से किया गया है। अतः ज्ञान के समान कर्म का अनुष्ठान भी करना ही चाहिये। कर्म का अनुष्ठान न करने पर स्मृति ने प्रत्यवाय भी बताया है। इससे भी स्पष्ट होता है कि मुमुक्षुओं को अवश्य ही कर्म करते रहना चाहिये ॥ ९ ॥ हृदयस्पर्शिनी यद्यपि “कर्मणा बध्यते जन्तुर्विद्यया च विमुच्यते । तस्मात् कर्म न कुर्वन्ति यतयः पारदर्शिनः” ॥ इस स्मृतिवाक्य को उपस्थित कर कहा जा सकता है कि मुमुक्षु को कर्म नहीं करना चाहिये। तथापि मोक्षफल के प्रति विद्या (ज्ञान) का सहकारी कर्म होने से उसका (कर्म का) अनुष्ठान करना ही होगा। निष्कर्ष यह है कि मुमुक्षु को विद्या (ज्ञान) प्राप्ति की तरह कर्मानुष्ठान भी आवश्यक है, क्योंकि "विद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह" इस समुच्चयविधि के द्वारा अविशेषेण (समान रूप से) दोनों का विधान किया गया है। किञ्च—"अकुर्वन् विहितं कर्म निन्दितं च समाचरन् । प्रसञ्जँश्चेन्द्रियार्थेषु नरः पतनमृच्छति” ॥ १. भ० गी० ३।५