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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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कूटस्थाऽद्वैतात्मबोधप्रकरण ३१७ हृदयस्पर्शिनी नेति—इस पर गुरु कहते हैं कि ऐसी बात नहीं है ।—'अर्थावगतिर्हि प्रमा'—अर्थावबोध को 'प्रमा' कहते हैं। उसको स्वरूपतः अनित्य मानने में कोई युक्ति नहीं है। चक्षुरादि इन्द्रियद्वारक बुद्धिवृत्ति से व्यक्त होने वाली अवगति(ज्ञान)रूप प्रमा के नित्य रहने पर उसमें 'प्रमात्व' नहीं रहता और उसके अनित्य रहने पर 'प्रमात्व' रहता है— ऐसा विशेष मानने में कोई विनिगमक नहीं है। अर्थात् 'ज्ञान' के नित्य या अनित्य होने से उसके प्रमात्व में कोई विशेषता नहीं होती ॥ ९५॥ नित्यायां प्रमातुरपेक्षाभावः, अनित्यायां तु यत्नान्तरितत्वादवगतिरपेक्षत इति विशेषः स्यादिति चेत् ॥९६॥ हृदयस्पर्शिनी नित्यायामिति—इस पर शिष्य 'विनिगमनाभाव नहीं है', ऐसी शंका कर रहा है। क्योंकि अवगति (संविद्) को नित्य मानने पर कारकव्यापार व्यर्थ हो जायगा, यह विशेष ही विनिगमक है। अर्थात् नित्य ज्ञान में प्रमाता की अपेक्षा नहीं होगी, क्योंकि अनित्य ज्ञान में ही प्रमाता के यत्न की अपेक्षा होती है। अर्थात् प्रमाता के यत्न से अनित्य ज्ञान ही साध्य होता है, इसलिये उसमें अवगति (प्रतीति) की अपेक्षा हुआ करती है। यह विशेषता यदि कही जाय तो विनिगम का भाव नहीं है ॥ ९६ ॥ सिद्धा तर्ह्यात्मनः प्रमातुः स्वतःसिद्धिः प्रमाणनिरपेक्षतयैवेति ॥९७॥ हृदयस्पर्शिनी सिद्धेति—गुरु कहते हैं कि नित्यज्ञान के पक्ष में प्रमाण की अपेक्षा नहीं है, ऐसा यदि तुम समझते हो तो प्रमाता आत्मा के स्वरूप की स्वतः सिद्धि अर्थात् स्वप्रकाशता उसी से अर्थात् प्रमाणनिरपेक्षता से ही सिद्ध हो जाती है। अनित्य और अस्वप्रकाश की जड़ता के कारण उसे आत्मा कहना अनुपपन्न है ॥ ९७ ॥ अभावेऽप्यपेक्षाऽभावः, नित्यत्वादेवेति चेत् ॥९८॥ हृदयस्पर्शिनी अभाव इति—उसपर शिष्य कहता है कि आत्मप्रभा के नित्य होने से यदि प्रमाण की अपेक्षा नहीं है, तो प्रमा का अभाव होने पर भी नित्य होने के कारण उसे प्रमाण की अपेक्षा नहीं है, ऐसा यदि कहें तो क्या हानि है ? ॥९८॥ न, अवगतेरेवात्मनि सद्भावादिति परिहृतमेतत् । प्रमातुश्चेत्प्रमाणापेक्षा सिद्धिः, कस्य प्रमित्सा स्यात् ? यस्य प्रमित्सा, स एव प्रमाताऽभ्युपगम्यते । तदीया च प्रमित्सा प्रमेयविषयैव, न प्रमातृविषया, प्रमातृविषयत्वेऽनवस्थाप्रसङ्गात्प्रमातुस्तदिच्छायाश्च तस्याप्यन्यः प्रमाता तस्याप्यन्य इति । एवमेवेच्छायाः । प्रमातृविषयत्वे प्रमातुरात्मनोऽव्यवहितत्वाच्च प्रमेयत्वानुपपत्तिः । लोके हि प्रमेयं नाम प्रमातुरिच्छास्मृतिप्रयत्नप्रमाणजन्मव्यवहितं सिद्ध्यति, नान्यथा अवगतिः प्रमेयविषया दृष्टा । न च प्रमातुः प्रमाता स्वस्य स्वयमेव केनचिद्व्यवहितः कल्पयितुं शक्यः इच्छादीनामप्यतमेनापि । स्मृतिश्च स्मर्तव्यविषया, न स्मर्तृविषया । तथेच्छाया इष्टविषयत्वमेव, नेच्छावद्विषयत्वम्, स्मर्त्रिच्छावद्विषयत्वेऽपि ह्युभयोरनवस्था पूर्ववदपरिहार्या स्यात् ॥९९॥ हृदयस्पर्शिनी नेति—गुरु कहते हैं कि ऐसी बात न कहो। क्योंकि आत्मा में अवगति (ज्ञान) के सद्भाव के कारण ही उसे प्रमाण की अपेक्षा नहीं होती। अवगति (प्रमा) के अभाव की आशंका ही नहीं की जा सकती। अर्थात् स्वयं अवगति