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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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१० उपदेशसाहस्री देहाद्यैरविशेषेण देहिनोग्रहणं निजम्। प्राणिनां तदविद्योत्थं यावत्कर्मविधिर्भवेत् ॥ १६ ॥ देहाद्यैरिति—देहधारि प्राणियों को अपने देहादि के साथ आत्मा का अभिन्न रूप से ज्ञान (ग्रहण) हो रहा है, वह अविद्या के कारण हो रहा है। अतः जब तक वह बना हुआ है, तब तक उसके लिये कर्म की भी विधि है। अर्थात् उसे कर्म करते रहना चाहिये ॥ १६ ॥ हृदयस्पर्शिनी कर्मवादी का आक्षेप है कि 'ज्ञात्वा कर्म समाचरेत्', तथा कर्मविधि को न मानने पर स्वर्गकामादि विधि के अनुपपन्न होने से और 'देहादि से भिन्न आत्मा है'—यह ज्ञान जिसे हो उसे ही कर्म करने का अधिकार होने से, सभी को कर्म करते ही रहना चाहिये । ज्ञान और कर्म में विरोध यदि समझा जाय तो कर्माधिकार के प्राप्त न हो सकने से अधिकारी के अभाव में कोई कर्मानुष्ठाता ही न रहने के कारण वेदका कर्मकाण्ड भाग ही अप्रमाण हो जायगा । उक्त आक्षेप का समाधान यह है कि कर्मस्वरूप, कर्मभेद, उनका परस्पर अङ्गाङ्गिभाव, प्रयोज्य-प्रयोजकभाव, क्रम, अधिकार आदि का विशेष ज्ञान रखनेवाले तथा देहातिरिक्त आत्मा है—यह समझने वाले अधिकारी की कर्मविशेष में अपेक्षा रहने पर भी परमात्मतत्त्वज्ञान की कर्म में कोई अपेक्षा नहीं होती, क्योंकि उसका वहाँ कोई उपयोग नहीं है। तथा दोनों (ज्ञान, कर्म) के अधिकारी भी भिन्न-भिन्न होने से दोनों के समुच्चय की कोई बात ही नहीं है। कर्म के अधिकारी के लिये कर्मकाण्ड भाग रहेगा और ज्ञान के अधिकारी के लिये ज्ञानकाण्ड का भाग होगा। अतः कर्मकाण्ड भाग अप्रमाण नहीं है। अथवा यदि औपनिषद ज्ञान, कर्म-कारकभेद का उपमर्दक (बाधक) होता, तो ज्ञानकाण्ड के द्वारा कर्मकाण्ड का विषय अपहृत कर लिया होता, और कर्मकाण्ड के लिये कोई विषय ही न रहता । तब उस स्थिति में विषय बाधित हो जाने से कर्मकाण्ड भाग अप्रमाण कहा जाता । किन्तु स्वाध्यायाध्ययन विधि के साथ विरोध होने से उस भाग को अप्रमाण कहना इष्ट नहीं है । किञ्च—कर्मकाण्ड पर अप्रामाण्यापत्ति देने वाले से हम यह पूछते हैं कि वह आपत्ति आत्मतत्त्वज्ञान से पूर्व होगी या उसके पश्चात् होगी ? प्रथम पक्ष तो ठीक नहीं रहेगा, क्योंकि प्राणियों को अपनी आत्मा का ज्ञान जबतक देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, प्राण के रूप में या उनके धर्मों के रूप में अविवेक के कारण होता रहेगा, तद्विशिष्ट होने के कारण ही आत्माभिमानरूप स्वाभाविक—अर्थात् योषित् आदि में अग्निभाव की बुद्धि के समान विधि से न होनेवाले—रूप से प्राणियों को जो आत्मज्ञान होता है, वह अविद्या के कारण होता है, अर्थात् अनादि अज्ञान से होनेवाली भ्रान्ति के संस्कार से होता है, वह तो सर्वसाधारण है । अर्थात् जब तक मैं ब्राह्मण हूँ, मैं गृहस्थ हूँ, समस्त इन्द्रियों से सम्पन्न मैं हूँ, मैं सकाम बलवान् हूँ आदि आदि ज्ञान होता रहता है, तब तक यह कर्मविधि (कर्मकाण्ड भाग) प्रमाण ही है। प्रमिति (बोध) जनक को प्रमाण कहते हैं। और वेद अधिकारी के लिये ही प्रमितिजनक होता है, अनधिकारी के लिये नहीं। अतः कर्मप्रवृत्ति तक प्रमितिजनक कर्मकाण्डभाग (विधिकाण्ड) को अपने अधिकारी (अनुष्ठाता) का लाभ हो जाने से ब्रह्मात्मतत्त्वविद्या के उदय होने से पूर्व अप्रामाण्यापत्ति नहीं हो रही है। अतः अध्ययनविधि के साथ विरोध भी नहीं है। निष्कर्ष यह है कि आत्मा का ज्ञान, देहादिव्यतिरिक्त के रूप में होने पर भी ब्रह्मज्ञान न होने से मूलाज्ञान की सत्ता तो रहती ही है। अतः उससे उत्पन्न होनेवाले अभिमान के कारण कर्मप्रवृत्ति चलती रहती है। एवञ्च आत्मज्ञान से पूर्व होनेवाली कर्मकाण्ड प्रवृत्ति में कोई विरोध नहीं है ॥ १६ ॥ नेति नेतोति देहादीनपोह्यात्माऽवशेषितः । अविशेषात्मबोधार्थं तेनाविद्या निवर्तिता ॥ १७ ॥ नेतीति—आत्मा निर्विशेष है, उसके बोध (ज्ञान) के लिये 'नेति नेति' इत्यादि श्रुति के द्वारा देह, इन्द्रिय आदि का निषेध (बाध) कर शुद्ध आत्मा ही शेष रहता है, उस आत्मा के ज्ञान से अविद्या की निवृत्ति होती है ॥ १७ ॥

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