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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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मतिविलापनप्रकरणम् 'चितिस्वरूपे स्वत एव मे मते रसादियोगस्तव मोहकारितः । अतो न किञ्चित्तव चेष्टितेन मे फलं भवेत्सर्वविशेषहानतः ॥१॥ चितीति—मेरे मत में आत्मा का स्वरूप 'ज्ञान' ही है। उसके साथ रस, रूप आदि विषयों का सम्बन्ध अथवा रागादिनिबन्धन भोक्तृत्वादिसम्बन्ध (हे बुद्धे) तेरे मोह के कारण है। आत्मा में समस्त विशेष धर्मों का अभाव होने से (हे बुद्धे !) तेरी चेष्टाओं का मुझपर कोई परिणाम नहीं हो सकता ॥ १ ॥ हृदयस्पर्शानी यदि विद्या (ज्ञान) एवं अविद्या (अज्ञान) को बुद्धिगत (बुद्धि के धर्म) माना जाय, तो सांख्यसिद्धान्त को मान लेने का प्रसंग आवेगा; क्योंकि सांख्यवादी विद्वान्, 'पुरुष' (जीवात्मा) के भोग और मोक्ष के लिये ज्ञान-अज्ञान को बुद्धिगत (बुद्धि के ही धर्म) ही मानते हैं। अतः उक्त सांख्यसिद्धान्त के खण्डनार्थ तथा आत्मा स्वतःसिद्ध ज्ञान- स्वरूप है, यह बताने के लिये 'आत्मा' और 'बुद्धि' के संवादरूप प्रकरण का आरंभ किया जा रहा है। पूर्व प्रकरण में ब्रह्मात्मज्ञान की सिद्धि स्वानुभव के द्वारा बताई थी, उसी को पुनः आत्म-बुद्धिसंवाद के द्वारा बताया जा रहा है, जिससे 'ब्रह्मात्मज्ञान' की दृढ़ता हो जाय ॥ १ ॥ विमुच्य मायामयकार्यतामिह प्रशान्तिमायाह्यसदीहितात् सदा । अहं परं ब्रह्म सदा विमुक्तवत् तथाऽजमेकं द्वयवर्जितं यतः ॥२॥ विमुच्येति—मैं (आत्मा) सदा ही 'विमुक्तवत्' अर्थात् विमुक्त के समान हूँ, तथा मैं 'एक' अर्थात् सजातीय- भेदरहित और 'अद्वितीय' अर्थात् विजातीयभेदरहित, और अजन्मा अर्थात् जन्मादि समस्त विकाररहित 'ब्रह्म' ही हूँ। अतः (हे बुद्धे !) अपनी समस्त मायामय चेष्टाओं का त्याग कर तू हमेशा के लिये मुझ में (आत्म स्वरूप में) शान्त हो जा, व्यर्थ प्रयास न कर ॥ २ ॥ हृदयस्पर्शिनी हे बुद्धे ! जब कि तुझ में किसी प्रकार की कोई विशेषता नहीं है, तब तुम्हारी किसी भी चेष्टा से मुझ निर्विशेष (अनाधेयातिशय) पर कोई फल (परिणाम) होना नहीं है। अतः तुम्हारा शांत हो जाना ही उचित है। हे बुद्धे ! तुम्हारी जो चेष्टाएँ हैं, वे सब मिथ्या चेष्टाएँ हैं, क्योंकि वे सब अविद्या के कारण (अविद्यामूलक) हो रहीं हैं। इसलिए उन मिथ्या चेष्टाओं का त्याग कर अपने निरर्थक प्रयास (असत् ईहित) से अब शांत हो जाओ और मुझ प्रत्यगात्मा (जीवात्मा) में आकर विलीन हो जाओ। मूल में प्रयुक्त 'मायामयकार्यता' (मायामयचेष्टित) और 'असदीहित' शब्दों से 'अविद्यानिबन्धनत्व' (अविद्यामूलकत्व) सूचित किया गया है, अतः सांख्यसिद्धांत के प्राप्त होने का कोई प्रसंग नहीं है। बुद्धि (मन) का लय सत्य-ज्ञानस्वरूप ब्रह्म में न बताकर प्रत्यगात्मा (जीवात्मा) में क्यों बताया ? यह जिज्ञासा जाग उठती है, उसके समाधानार्थ मूल में ही 'अहं परं ब्रह्म सदा विमुक्तवत्' कहा गया है कि मैं तो सर्वदा (नित्य) 'ब्रह्म' ही हूँ। जब कि मैं (प्रत्यगात्मा-जीव) ब्रह्म हूँ तब सदैव (हमेशा) ही विमुक्तवत् अर्थात् मुक्त के समान हूँ, क्योंकि मुक्ति तो उसकी होगी, जिसको बन्ध हुआ हो। मुझे बन्ध न होने से मेरी मुक्ति कैसे ? मैं तो बन्ध और मुक्ति दोनों से रहित हूँ। उसी प्रकार मूल में 'अजं एकं द्वयवर्जितं' ये तीन विशेषण 'आत्मा' (अहम्) के दिये गये हैं। इन विशेषणों के उपयोग का विचार करें। 'अजम्' विशेषण तो जन्मादि समस्त विकारों का प्रतिषेध करने के लिए है। 'एकम्' से सदा एकरूपता अथवा सजातीयभेदशून्यता को सूचित किया है। 'द्वयवर्जितम्' से विजातीय- भेदराहित्य को बताया है। अतः मुझ प्रत्यगात्मा में एक होने, (समा जाने-विलीन होने) का तात्पर्य यही है कि 'ब्रह्म' में ही समाजाना। इस प्रकार मन का लय प्रत्यगात्मा में बताने से कोई किसी प्रकार का 'परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति' (मुं० उ० ३।२।७) श्रुतिविरोध भी नहीं है। १. चितिः स्वरूपं०—पाठान्तरम् । ५