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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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४० उपदेशसाहस्री ज्ञानकर्मता (ज्ञान का कर्म आत्मा है) बताने में नहीं है। तथापि 'यत्र नान्यत् पश्यति' इत्यादि श्रुति के द्वारा आत्मा के लिए अन्य दर्शनादि का निषेध होने से 'द्रष्टव्यः' श्रुति, आत्मा को दर्शन आदि की अभ्यनुज्ञा दे रही है, यह प्रतीत होता है। अतः आत्मा में दृश्यता प्राप्त होने से अन्य दृश्य विषयों के समान उसका असत्त्व ही क्यों न माना जाय ? किन्तु यह शंका ठीक नहीं है। 'यत्र नान्यत् पश्यति' इस श्रुतिवाक्य का तात्पर्य चक्षुरादि के द्वारा भ्रम से होनेवाले अन्यदर्शन आदि की निवृत्ति में है, आत्मा में दर्शनादि की कर्मता के बताने में नहीं है। एवं च 'द्रष्टव्यः' इस श्रुति से जिस प्रकार ज्ञानकर्मता नहीं बन पाई, उसी प्रकार, 'यत्र नान्यत् पश्यति' श्रुति¹ का पूर्व उपन्यस्त श्रुति के साथ विरोध होने के भय से तथा श्रुति का तात्पर्य आत्मदर्शन विधि में होने के कारण भूमा (ब्रह्म) में ज्ञान की कर्मता तो है ही नहीं, यह निश्चय किया गया है। एवं च अविषय, नित्य, भूमा, प्रत्यगात्मा सर्वान्तर सिद्ध हो जाता है ॥ ९ ॥ ॥ इति नवमं सूक्ष्मताव्यापिताप्रकरणं समाप्तम् ॥ १. ३'यत्र नान्यत् पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमा'—( छां. उ. ७।२४।१ )

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