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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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दृशिस्वरूपपरमार्थदर्शनप्रकरणम् ४५ इस कारण मैं किसी से लिप्त नहीं हो पाता। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् स्वयं कहते हैं कि "मैं परमात्मा अनादि तथा निर्गुण होने से 'अव्यय' हूँ । हे कौन्तेय ! मैं शरीरस्थ होता हुआ भी न कुछ करता हूँ और न किसी से लिप्त होता हूँ । जैसे सर्वव्यापक आकाश सूक्ष्म होने से किसी से लिप्त नहीं हो पाता, उसी तरह यह आत्मा (परमात्मा) शरीर में सर्वत्र रहता हुआ भी किसी से लिप्त नहीं हो पाता' ।।'' अर्थात् माया के द्वारा उपस्थित देहों में अनुप्रविष्ट रहने पर भी मैं उनके दोषों से दूषित नहीं हो पाता ।। ७ ।। सदा च भूतेषु समोऽहमीश्वरः क्षराक्षराभ्यां परमो ह्यथोत्तमः । परात्मतत्त्वं* च तथाऽद्वयोऽपि सन् विपर्ययेणाभि†मतस्त्वविद्यया ॥८॥ सदेति-मैं सम्पूर्ण भूतों में समान भाव से स्थित ईश्वर हूँ, मैं कार्य-कारण भाव से अलग (अतिरिक्त) हूँ। तथा उसका अधिष्ठान रहने से उनकी अपेक्षा मैं उत्कृष्ट हूँ, तथा मैं परमात्मतत्त्व और अद्वितीय होनेपर भी अविद्या के कारण विपरीत ( अन्यथा) रूप से समझा जाता हूँ ॥ ८ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मोपलब्धि के अधिष्ठानस्वरूप देहादिकों की विषमता सबके प्रत्यक्ष है, ऐसे विषम देहों में प्रविष्ट हुए आत्मा की उपलब्धि होती है। अतः उस उपलभ्यमान आत्मा में भी देहादिकृत वैषम्य का होना संभव है, ऐसी स्थिति में कैसे उसका परमात्मत्व और कैसी उसकी परिपूर्णता ? किन्तु तारतम्य (वैषम्य) का यह प्रतिभास अविद्या का विलास मात्र है, वास्तविक नहीं है। देह में उसका अनुप्रवेश व्यवहार की दृष्टि में है, वस्तुतः नहीं है। 'आत्मा' को ईश्वर कहा गया है, इससे यह सूचित होता है कि वह उपाधि के परवश ( परतन्त्र) नहीं है। अतः उसमें (आत्मा में) देहादिकृत वैषम्य नहीं है। आत्मा को 'ईश्वर' (नियामक) कहनेपर उसे ईशितव्य (नियम्य) की अपेक्षा अवश्य रहेगी, उसके बिना उसमें ईश्वरत्व (नियामकत्व) कैसे बन सकेगा ? अर्थात् उसे अद्वय कहना ठीक नहीं, वह तो सद्वय है। किन्तु यह शंका ठीक नहीं है, क्योंकि वह तो क्षर-अक्षर (कार्य-कारण) से परम (व्यतिरिक्त) है इसी कारण उसे 'उत्तम' (उत्कृष्ट) कहते हैं। अतः उसकी अद्वयता सुरक्षित है। और उसका ईश्वरत्व भी उचित है। 'क्षर' का अर्थ कार्यवर्ग है क्योंकि 'क्षरति नश्यति इति क्षरः' यह 'क्षर' शब्द का निर्वचन है। और 'अक्षर' का अर्थ कारण है। अर्थात् माया से युक्त (शबलित) चिद्वस्तु, उन दोनों से यह आत्मा परम (व्यतिरिक्त) है, अर्थात् कार्यकारणादि की भेदकल्पना का यह अधिष्ठानस्वरूप है। इसीलिये इसे (आत्मा को) पुरुषोत्तम कहते हैं। अतः आत्मा का 'ईश्वरत्व' भी समुचित है। उसके ईश्वरत्व में और अद्वयता में किसी प्रकार का कोई सन्देह नहीं है। वह 'उत्तम' है, उसी कारण अन्य आत्माओं का स्वरूप (तत्त्व) भी यानी परमात्मतत्त्व भी वही है, अर्थात् 'मैं' ही सर्वात्मा हूँ, यह समझना चाहिये। इस प्रकार वह सर्वात्मा होनेपर भी उसके स्वरूप का विपरीत भान (विपरीतस्वरूपप्रतिभास) जो हो रहा है, वह विपर्यय (मिथ्याज्ञान) से अर्थात् तत्कारणीभूत अविद्या से अवच्छिन्न (युक्त) होने के कारण उसके वास्तविक रूप का ज्ञान नहीं हो पाता। भगवदुक्ति से भी उपर्युक्त अभिप्राय का समर्थन हो जाता है-भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र ने कहा है१ कि 'इस लोक में क्षर और अक्षर नामके दो ही पुरुष हैं, उनमें समस्त भूत 'क्षर' हैं, और कूटस्थ 'अक्षर' है। इन दोनों से उपाधिरहित उत्तम पुरुष 'अन्य' ही है, जिसे परमात्मा कहते हैं, जो अव्यय (अविनाशी) ईश्वर है, १. "द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च । क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥ यस्मात् क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः । अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥" ( १५।१६-१८)

  • तत्त्वञ्च०-पाठान्तरम् । † भिभूत०-पाठान्तरम् ।