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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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अचक्षुष्ट्वप्रकरणम् ६९ विक्षेपो नास्ति तस्मान्मे न समाधिस्ततो मम । विक्षेपो वा समाधिर्वा मनसः स्याद्विकारिणः ॥१४॥ विक्षेप इति—मुझमें विकार न होने से ही मुझमें विक्षेप भी नहीं है और विक्षेप न होने से समाधि भी नहीं है। विक्षेप और समाधि तो विकारी मन के ही हो सकते हैं ॥ १४ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा की अविकारिता का जब निश्चय हो जाता है, तब विक्षेप भी नहीं होता। विक्षेप की निवृत्ति होनेपर समाधि भी नहीं होती अर्थात् विक्षेप के अभाव में समाधि का भी अभाव रहता है। विक्षेप और समाधि दोनों विकारवान् मन में ही हुआ करते हैं। अविकारी में उन दोनों का अभाव रहता है ॥ १४ ॥ अमनस्कस्य शुद्धस्य कथं तत्स्याद्द्वयं मम । अमनस्त्वाविकारित्वे विदेहव्यापिनो मम ॥१५॥ अमनस्कस्येति—मैं मनःशून्य और शुद्ध हूँ, मुझे वे दोनों [समाधि और विक्षेप] कैसे हो सकते हैं? मुझमें मनःशून्यता और शुद्धता तो मेरे देहहीन और व्यापक होने के कारण है ॥ १५ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा यदि मन की तरह विकारी होता या मन के साथ उसका यदि तादात्म्य रहता तो उसमें (आत्मा में) विक्षेप-समाधि का संभव हो सकता था। किन्तु दोनों न होने से विक्षेप, समाधि दोनों नहीं हो पाते। आत्मा विदेह होने से उसमें अमनस्कत्व और व्यापित्व (व्यापकता) होने से अविकारित्व है ॥ १५ ॥ इत्येतद्यावदज्ञानं[तं] तावत्कार्यं ममाभवत् । नित्यमुक्तस्य शुद्धस्य बुद्धस्य च सदा मम ॥१६॥ इतीति—नित्यशुद्ध, नित्यमुक्त और सर्वदा बोधस्वरूप होने पर भी जब तक मुझे अपने स्वरूप का अज्ञान था तब तक ही मेरे लिये समाधि आदि कर्त्तव्यकार्य थे ॥ १६ ॥ हृदयस्पर्शिनी यद्यपि मैं नित्य, मुक्त, बुद्ध, शुद्ध हूँ तथापि जबतक मुझे अपने नित्यत्व, शुद्धत्व-मुक्तत्वादि का अज्ञान था, तबतक मेरी समाधि आदि में कर्तव्यबुद्धि थी, किन्तु अब नित्यत्व शुद्धत्व, मुक्तत्व का ज्ञान होने पर उसकी मुझे कोई आवश्यकता नहीं है। अर्थात् अब उसमें मेरी कर्तव्यबुद्धि नहीं रही है ॥ १६ ॥ समाधिर्वाऽसमाधिर्वा कार्यं चान्यत्कुतो भवेत् । मां हि ध्यात्वा च बुद्ध्वा च मन्यन्ते कृतकृत्यताम् ॥१७॥ समाधिर्वेति—अब आत्मबोध हो जाने पर मेरे लिये समाधि, असमाधि अथवा अन्य कोई कर्त्तव्य कैसे हो सकता है ? मेरा ध्यान करके और मुझे जानकर तो मोक्ष की इच्छा रखने वाले लोग अपने को कृतकृत्य मानते हैं ॥ १७॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मस्वरूप का परिज्ञान होने पर किसी हेतु के न रहने के कारण समाधि आदि साधनों का अभ्यास करना अथवा न करना कर्तव्य नहीं रह जाता। ध्यान के द्वारा प्रत्यगात्मा का साक्षात्कार हो जाने पर कृतकृत्यता की सिद्धि हो जाने से कोई कर्तव्य शेष नहीं रह जाता। क्योंकि प्रत्यगेकरस मुझ ब्रह्म का ध्यान कर, विचार कर, जान कर, साक्षात्कार कर मुमुक्षु लोग कृतकृत्यता का अनुभव करते हैं। तथाच भगवती श्रुति भी कह रही है— 'एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य । न कर्मणा वर्धते नो कनीयान्'१ । इति। १. बृ. उ. ४।४।२३