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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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Page 98

७२ उपदेशसाहस्री ममात्माऽस्य त आत्मेति भेदो व्योम्नो यथा भवेत् । एकस्य सुषिरभेदेन तथा मम विकल्पितः ॥२२॥ ममेति—जिस प्रकार छिद्रभेद से एक ही आकाश का भेद समझा जाता है उसी प्रकार 'मेरा आत्मा और स्वयं आत्मा' इस प्रकार भेद की कल्पना मुझमें की जाती है । अर्थात् ब्रह्म [आत्मा] तो पूर्ण ही है तथापि औपाधिक भेद की कल्पना उसमें की जाती है ॥ २२ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'मेरा आत्मा ब्रह्मरूप है, मैं स्वयं ब्रह्मरूप हूँ'—इस प्रकार जो यह आत्माऽत्मीयभाव के रूप में भेदप्रतिभास होता रहता है, ऐसी स्थिति में अद्वितीय ब्रह्मत्व कैसे माना जाय ? उक्त आशंका का समाधान यह है कि 'मैं' तो एक ही हूँ, किन्तु अन्तःकरण आदि उपाधिकृत भेद का मुझपर आरोप किया जाता है । जैसे आकाश स्वयं एक ही है किन्तु छिद्रभेद से अंशांशिभावरूप भेद का आरोप उस एक आकाश में करते हैं, उसी तरह मेरे विषय में समझो । अतः मेरी वास्तविक एकता में कोई विरोध नहीं है ॥ २२ ॥ भेदोऽभेदस्तथा चैको नाना चेति विकल्पितः । ज्ञेयं ज्ञाता गतिर्गन्ता मध्येकस्मिन्कुतो भवेत् ॥२३॥ भेदोऽभेद इति—मुझ एक में ही भेद-अभेद तथा एक-अनेक की कल्पना की जाती है । वस्तुतः एकाकी रहने वाले मुझ आत्मा में ज्ञेय, ज्ञाता और फल, फलभोक्ता की कल्पना कैसे की जा सकती है ? ॥ २३ ॥ हृदयस्पर्शिनी अविद्या दशा में भेदव्यवहार के रहने पर भी अब आत्मज्ञान के होने पर वह भेदव्यवहार भी नहीं होता । वस्तुतः 'मैं' तो एक ही हूँ, किन्तु आत्मज्ञान होने के पूर्व अर्थात् अज्ञान दशा में मेरे विषय में यह बुद्धि, भेद-अभेद तथा एक और अनेक का व्यवहार किया करती थी, किन्तु विचार (आत्मजिज्ञासा) करने पर मुझ अकेले (एकाकी) में ही ये सब व्यवहार किस प्रकार हो सकते हैं ? अर्थात् 'मैं' ही ज्ञेय और मैं ही ज्ञाता और मैं ही फल (गति) तथा मैं ही फल पानेवाला भोक्ता (गन्ता) कैसे हो सकता हूँ । परंतु यह सब विचार करने पर (आत्मज्ञान होने पर) समझ में आता है; विचार के पूर्व नहीं ॥ २३ ॥ न मे हेयं न चादेयमविकारी यतो ह्यहम् । सदा मुक्तस्तथा शुद्धः सदा बुद्धोऽगुणोऽद्वयः ॥२४॥ न म इति—मेरे लिये न कुछ त्याज्य है और न कुछ ग्राह्य है, क्योंकि मैं [आत्मा ] विकाररहित हूँ, नित्य मुक्त, शुद्ध तथा नित्य ज्ञानरूप [बोधरूप], निर्गुण और अद्वितीय हूँ ॥ २४ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा को जो निर्विशेष कहा, वह अभी समझ में नहीं आ रहा है, क्योंकि 'संसारित्व' को त्याज्य (हेय) कहा है और 'ब्रह्मत्व' को उपादेय (ग्राह्य) बताया है । ऐसी स्थिति में उसे (आत्मा को) निर्विशेष कैसे कह सकते हैं ? मेरी सर्वविशेषशून्यता (निर्विशेषता) इस प्रकार है कि मैं अविकारी हूँ। उस अविकारिता को 'अविकारी यतो ह्यहम्' में जो 'ही' शब्द है, उससे सूचित किया गया है । क्योंकि 'अविकार्योऽयमुच्यते' १ ऐसी स्मृति है । अविकारी रहने का फल यह है कि 'मैं' सदैव बन्धसंसर्गशून्य (मुक्त) हूँ, उसी तरह तद्धेतुभूत अविद्यासम्बन्ध से रहित हूँ अर्थात् शुद्ध हूँ । शुद्ध रहने में कारण यह है कि मैं सदैव बुद्ध हूँ। किन्तु बोध (ज्ञान) को नैयायिकों की तरह मेरा गुण न समझना । क्योंकि मैं तो अगुण अर्थात् निर्गुण (गुणरहित) हूँ, अतः बोध (ज्ञान) रूप हूँ । बोधरूप कहने से यह न समझना कि कुछ मेरे लिये बोध्य (ज्ञेय) है, क्योंकि मैं तो अद्वय हूँ अर्थात् मेरे अतिरिक्त कोई अन्य है ही नहीं, ऐसी स्थिति में कौन ज्ञेय होगा ? कोई नहीं, क्योंकि सर्वत्र मैं ही मैं हूँ ॥ २४ ॥ १. भ. गी. २।२५