वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
by महर्षि कणाद
Source: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (origin)
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प्रथमोऽध्याय ९ अब केवल द्रव्य और गुण में कितना साधर्म्य हो जाता है, सो बताते हैं:- ९-द्रव्यगुणयोः सजातीयारम्भकत्वं साधर्म्यम् ॥ ९ ॥ (द्रव्यगुणयोः) द्रव्यों और गुणों में (सजातीयारम्भकत्वम्) अपने सजातियों को बनाने वाला होना (साधर्म्यम्) सामान्य है ॥ ९॥ अर्थात्- १०-द्रव्याणि द्रव्यान्तरमारभन्ते गुणाश्च गुणान्तरम् ॥ १० ॥ (द्रव्याणि) द्रव्य (द्रव्यान्तरम्) दूसरे द्रव्य को (आरभन्ते) अपने में से बनाते हैं (च) और (गुणाः) गुण (गुणान्तरम्) अन्य गुण को [बनाते हैं] ॥ यद्यपि ८ वें सूत्र में कहे "अविशेष" शब्द की अनुवृत्ति से ही सूत्र ९ में साधर्म्य का अर्थ चल जाता, परन्तु अविशेष का और भी स्पष्ट करने के लिये तथा वाक्य के लालित्य प्रकाशनार्थ दूसरे शब्द "साधर्म्य" का प्रयोग आचार्य ने किया जान पड़ता है, जैसा कि आचार्य ने ९ वें सूत्र के भाष्यरूप इस १० वें सूत्र को लिख दिया है ॥ १० ॥ तौ जिस प्रकार द्रव्यों से द्रव्य बनते हैं, इसी प्रकार क्या कर्मों से कर्म भी बनते हैं ? उत्तर- ११-कर्म कर्मसाध्यं न विद्यते ॥ ११ ॥ (कर्मसाध्यं) जिस का कर्म साध्य हो वह (कर्म) कर्म (न) नहीं (विद्यते) है ॥ ऐसा कर्म कोई नहीं है जिस से कर्मान्तर बनता हो क्योंकि 'कर्म' उत्पन्न होते ही 'विभाग' को उत्पन्न करता है, तो फिर वह स्वयं उत्पन्न कर्म किसी अन्य कर्म को क्या उत्पन्न करेगा ? प्रश्न-एक बारं कन्दुक (गेंद) को पृथिवी पर गट्टा देते हैं, वह एक कर्म है, फिर गेंद उछल कर पृथिवी पर गिरती और फिर उछलती है, तब क्या उछलना कर्म, कर्म से ही उत्पन्न नहीं हुवा ? यदि हुवा तो कर्मसाध्य कर्म क्यों नहीं ? उत्तर-गेंद को गट्टा देकर उस में वेगाख्य संस्कार उत्पन्न किया गया था, संस्कार गुणों में है, कर्मों में गिना नहीं गया, उस वेग ने कर्म उत्पन्न किया, न कि कर्म ने कर्मान्तर ॥ ११ ॥ द्रव्यों, गुणों और कर्मों का साधर्म्य कह कर अब गुणों, कर्मों और द्रव्यों का वैधर्म्य कहते हैं- २
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