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वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

by महर्षि कणाद

Source: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (origin)

DevanagariSanskritpublished160 pages

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१४ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद गुणों का साधर्म्य यह है कि वे सजातीय गुणान्तर के आरम्भक (कारण) होते हैं, जहां इस का विरोध हो, वह वैधर्म्य होगा, अथवा गुणों का सा- धर्म्य यह है कि वे द्रव्याश्रयी होते हैं, इस के विरुद्ध कर्मपन को वैधर्म्य कहेंगे । इस लिये कर्मों का कार्य कर्म नहीं होते । अर्थात् यद्यपि द्रव्याश्रयत्व में कर्म को कर्मान्तर से समानता है, तो भी जैसे कारणगुण रूपादिक, अपने कार्य रूपादि का आरम्भ करते हैं, वैसे अवयव के कर्म अवयवी में कर्मोत्पादक नहीं होते । यह बात पूर्व सूत्र ११ वें में कह भी आये थे, तथापि यहां पुन- रुक्ति दोष इस कारण नहीं मानना चाहिये कि ११ वें सूत्र में कारण सामान्य का निषेध किया था, और इस सूत्र में कार्य सामान्य का निषेध करते हैं ॥ २४ ॥ द्रव्यों का कार्य द्रव्य कह कर अब द्रव्यों का कार्य जो कईएक गुण हैं, उन का कथन करते हैं:- २५-द्वित्वप्रभृतयः संख्याः पृथक्त्वसंयोगविभागाश्च ॥ २५ ॥ २३ वें सूत्र में से "द्रव्याणां, कार्यं" की अनुवृत्ति चली ही आती है (द्वित्वप्रभृतयः) द्वित्वादि (संख्याः) संख्यायें, (पृथक्त्वसंयोगविभागाः) पृथक्त्व, संयोग और विभाग (च) भी [द्रव्यों का कार्य हैं, यह सामान्य है]। एकत्व संख्या तौ किसी द्रव्य का कार्य नहीं, क्योंकि एकत्व तो सभी में अनुगत होने से किसी का कार्य नहीं हो सकती, हां द्वित्व त्रित्व आदि संख्यायें अनेक द्रव्यों के मेल से उत्पन्न होती है, अतः वे द्रव्यों का कार्य होती हैं, तथा पृथक् होना, जुड़ना, और विछुड़ना; ये भी द्रव्यों के कार्य हैं ॥ २५॥ तौ क्या जिस प्रकार द्वित्वादि, द्रव्यों का कार्य हैं, वैसे कर्म भी हैं ? उत्तर-नहीं, क्योंकि- २६-असमवायात्सामान्यकार्यं कर्म न विद्यते ॥ २६ ॥ (असमवायात्) समवाय सम्बन्ध न होने से (कर्म) कर्म (सामान्य- कार्यं) सामान्य कार्य (न) नहीं (विद्यते) है ॥ कर्मों का द्रव्यों से समवाय सम्बन्ध नहीं, अर्थात् नित्य संबन्ध नहीं इस लिये कर्म द्रव्यों के कार्य सामान्य में नहीं गिनाये जा सकते ॥ २६ ॥ २७-संयोगानां द्रव्यम् ॥ २७ ॥