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वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

by महर्षि कणाद

Source: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (origin)

DevanagariSanskritpublished160 pages

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ओ३म् अथ द्वितीयोऽध्यायः तत्र प्रथमाह्निकम् अब द्रव्यों का लक्षण आरम्भ करते हुये, प्रथम ९ द्रव्यों में से पहिली पृथिवी का लक्षण करते हैं:— ४६-रूपरसगन्धस्पर्शवती पृथिवी ॥ १ ॥ ( ऊ-ती ) रूप, रस, गन्ध, और स्पर्शवाली ( पृथिवी ) पृथिवी है ॥ पृथिवी में गन्ध गुण अपना और रूपादि तीन गुण अपने से पहिले तेज, अप्, और वायु के मिलाकर ४ गुण हैं । आकाश का पांचवां गुण शब्द यहां इस लिये पृथिवी में नहीं गिनाया कि प्रत्येक शास्त्रकार अपने सूत्रों में अपने अभिमत लाक्षणिक अर्थों के लाक्षणिक शब्दों का प्रयोग करता है । यद्यपि न्यायशास्त्रादि में ५ वां महाभूत आकाश गिनाया है, सांख्य में उस को प्रकृति का कार्य कहा गया है, जिस का गुण शब्द है, परन्तु वैशेषिक दर्शन में आकाश का गुण शब्द नहीं गिनाया, किन्तु शब्द को एक प्रकार से वायु गुण मानलिया हो, और उस आकाश को भी जिस को सांख्यादि ने प्रकृति का कार्य माना है, वैशेषिक ने वायु के अन्तर्गत समझा हो, ऐसा जान पड़ता है। क्योंकि वैशेषिक के आचार्य कणाद मुनि ने आगे चलकर इसी अध्याय और आह्निक के सूत्र २० में “निष्क्रमणं प्रवे०” केवल निकलना व प्रवेश करना मात्र आकाश का चिन्ह कहा है, शब्द नहीं । इस से पाया जाता है कि वैशेषिक शास्त्र में आकाश कोई प्राकृत पदार्थ नहीं, किन्तु दिशा और काल के समान एक तीसरा द्रव्य आकाश भी है, जो शून्यार्थक व्यावहारिक है । परन्तु न्याय सांख्यादि के अभिमत आकाश (महाभूत) का इस से खण्डन नहीं समझना चाहिये, किन्तु जैसे सांख्य ने अपने मतानुसार एक प्रकृति को उपादान कारण माना है, और आकाशादि ५ महाभूतों को तदन्तर्गत कार्य माना है, और न्याय में प्रकृति का नाम न लेकर केवल आकाशादि ५ महाभूतों से ही सब जगत् की रचना मानते हुये, उन्हीं को उपादान कारण माना है। इसी प्रकार वैशेषिक ने कुछ कार्य कारणपने की विवक्षा से नहीं, किन्तु व्यावहारिक संज्ञा रखकर अपना व्यवहार चलाने को पृथिवी

CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.