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वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

by महर्षि कणाद

Source: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (origin)

DevanagariSanskritpublished160 pages

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३२ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद अब पूर्व सूत्र पर शङ्का करते हैं किः- ६९-तदङ्गलिङ्गमेकद्रव्यत्वात्कर्मणः ॥ २१ ॥ ( कर्मणः ) कर्म को ( एकद्रव्यत्वात् ) एक द्रव्य वाला होने से ( तत् वह=निष्क्रमण और प्रवेश ( अलिङ्गम् ) लिङ्ग नहीं हो सकता ॥ प्रत्येक कर्म, एक द्रव्य में होता है, इसी प्रकार प्रवेश भी प्रविष्ट द्रव्य वाला है और निष्क्रमण भी निष्क्रान्त द्रव्य वाला है। इस में आकाश का लिङ्ग मानना किसी को उपपन्न नहीं होता ? ॥ २१ ॥ तथा- ७०-कारणान्तरानुक्लृप्तिवैधर्म्याच्च ॥ २२ ॥ ( का-र्म्यात् ) अन्य कारण की कल्पना के वैधर्म्य से ( च ) भी ॥ जिस कारण से जो कार्य होता पाया जावे, उसी को उस का कारण मानना चाहिये, अन्य कारण की कल्पना में वैधर्म्य है। बस निकलने बड़ने वाले द्रव्यों को जो निकलने बड़ने का स्वयं कारण हो सकते हैं, छोड़ कर एक अन्य कारण ( आकाश ) की कल्पना करना ठीक नहीं ? ॥ २२ ॥ आगे समाधान करते हैं किः- ७१-संयोगादभावः कर्मणः ॥ २३ ॥ ( संयोगात् ) संयोग से ( कर्मणः ) कर्म का ( अभावः ) अभाव है ॥ आकाश में संयोग से क्रिया नहीं, किन्तु फलसंनिधान है। कर्म क्रिय को कहते हैं और क्रिया किसी व्यापार और फल को कहते हैं, निष्क्रमर और प्रवेश दोनों व्यापार हैं, उन व्यापारों से उत्पन्न फल यह है कि निक लने और प्रवेश करने वाले पदार्थ का संयोग विशेष होना। तब आका में फल के समवाय से व्यापार का समवाय नहीं, सो तौ ठीक, परन्तु इत से आकाश को अकारण तौ नहीं कह सकते, हां उपादान कारण न सही परन्तु निमित्त कारण तौ है ही क्योंकि आकाश के बिना निष्क्रमण औ प्रवेश हो नहीं सक्ते ॥ यदि कोई कहे कि इस से आकाश का होना मात्र पाया गया, परन् निकलने बड़ने का कारण होना क्योंकर पाया गया ? उत्तर यह है कि निय पूर्ववर्त्ती को कारण कहते हैं, सो प्रत्येक प्रवेश और निष्क्रमण से आका अवश्य पूर्ववर्त्ती है, जो सर्वकालवर्त्ती और ईश्वर के समान निश्चिन किय जा सकता है । इस लिये सूत्र २२ का यह कहना कि कारणान्तर की कल्पन

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