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वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

by महर्षि कणाद

Source: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (origin)

DevanagariSanskritpublished160 pages

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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri ५२ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद ज्ञाता चेतन आत्मा जो इन्द्रियों से अपने २ विषयों को ही ग्रहण कराता है, उन से भिन्न है ॥ इन्द्रियचैतन्यवादियों के मत का खण्डन करके, अब देहात्मवादियों का खण्डन करते हैं:- शरीरदाहे पातकाभावात् ॥ ४ ॥ उ०-शरीर को जलाने में पाप न होने से (आत्मा शरीर से पृथक् है) ॥ यदि शरीर से भिन्न कोई आत्मा नहीं है तो मृत शरीर को जलाने में पाप होना चाहिये, परन्तु पाप सजीव शरीर को जलाने में होता है, न कि मृत शरीर को ॥ अब इस पर शङ्का करते हैं:- तदभावः सात्मकप्रदाहेऽपि तन्नित्यत्वात् ॥ ५ ॥ पू०-उस (आत्मा) के नित्य होने से सजीव शरीर के जलाने में भी पाप न होना चाहिये ॥ सजीव शरीर के जलाने में भी पाप का अभाव होना चाहिये, आत्मा के नित्य होने से क्योंकि जो देह से भिन्न आत्मा को मानते हैं, वे उस को नित्य भी मानते हैं। यथा-“न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे”॥ अर्थात् आत्मा न कभी उत्पन्न होता और न मरता है, न कभी उत्पन्न हुआ न होगा, न मरा न मरेगा, वह अज, नित्य, सनातन और पुराण है, शरीर के नाश होने पर उस का नाश नहीं होता। तथा आगे चलकर उसी गीता में कहा है:-“नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः” ॥ अर्थात् आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकते, अग्नि नहीं जला सकता, जल गला नहीं सकते और पवन सुखा नहीं सकता है। जब ऐसा है तो फिर आत्मा सहित शरीर के जलाने में भी कुछ पाप नहीं होना चाहिये, क्योंकि नित्य आत्मा की कोई हिंसा नहीं कर सकता । यदि कहो कि हिंसा होती है तो आत्मा का नित्यत्व न रहेगा । इस प्रकार पहिले पक्ष में हिंसा निष्फल होती है और दूसरे पक्ष में उस की उपपत्ति नहीं होती। अब इस का समाधान करते हैं:- न, कार्याश्रयकर्त्तृवधात् ॥ ६ ॥ CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.

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