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वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

by महर्षि कणाद

Source: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (origin)

DevanagariSanskritpublished160 pages

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वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद

से पश्चात् उस का अभाव है । जैसे घट के नष्ट होने पर घट का अभाव है। यह अभाव सादि अनन्त है, क्योंकि घट के नाश से पहले घट का प्रध्वंसा- भाव न था, अतः सादि हुवा और घट के नाशक्षण से आरम्भ होकर अनन्तकाल के लिये अभाव हो गया । इस कारण यह प्रध्वंसाऽभाव सादि अनन्त हुवा । तब फलितार्थ यह निकला कि जन्य=कार्य के नाशोत्पन्न अभाव को प्रध्वंसाऽभाव कहते हैं । ३-किसी सद्बस्तु का एक देश को छोड़ कर अन्य देश में त्रैकालिक अभाव=अत्यन्ताऽभाव है । यह अनादि अनन्त है, क्योंकि यह अभाव तीनों कालों में एक सा रहता है, जो वस्तु जहां न थी न है, न होगी, उसका वहां अत्यन्ताऽभाव कहा जायगा । इस का तात्पर्य यह हुवा कि नित्यसंसर्ग के अभाव को अत्यन्ताऽभाव कहते हैं । ये तीनों अभाव अभाववादियों के मत में संसर्गाऽभाव कहलाते हैं। ४-एक वस्तु का अन्य वस्तु में जो अभाव है उस को अन्योन्याऽभाव कहते हैं। जैसे घट तौ पट नहीं, और पट घट नहीं । घट में पट और पट में घट के अभाव को अन्योन्याऽभाव कहेंगे । इसी को 'तादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकाऽभाव' भी कहते हैं । कोई लोग एक ५ वें प्रकार का अभाव भी मानते हैं, वह यह है कि- वृद्धि और क्षयवाला, समय विशेष में प्रतीत होने वाला='सामयिकाऽभाव ' कहाता है । उदयनाचार्य के मत में यह अत्यन्ताऽभाव के अन्तर्गत है, परन्तु इस की प्रतीति समयविशेष में इस प्रकार समझी जाती है कि घट वाले भूभाग में घटसम्बन्ध के प्रागऽभाव और प्रध्वंसाऽभाव तौ वर्तमान नहीं हैं, और अत्यन्ताऽभाव नित्य भी है तौ भी घट वाले भूभाग में बुद्धिस्थ नहीं होता, इस लिये सामयिकाऽभाव एक पांचवां जान पड़ता है । अभाव का अभाव तौ भाव ही है, अन्य कुछ नहीं, जैसा कि वाचस्पतिमिश्र तात्पर्य- टीका में कहते हैं कि-" नो खल्वभावऽभावोनाम कश्चिदन्योभावात, नाऽपि भावाभावोऽन्योऽभावात् ।" इस को नवीन लोग तीसरा अत्यन्ता- भाव बताते हैं । परन्तु उसके प्रागऽभाव स्वरूप होने से अनवस्था दोष नहीं । सामान्याऽभाव तौ विशेषाऽभावसमुदाय से भिन्न ही है, इस में सब को समानता है । अभाव क्या है ? इस के उत्तर में कोई तौ कहते हैं कि भाव से भिन्न अभाव है। कोई कहते हैं कि निषेधात्मक प्रतीति का विषय होगा अभाव है । तथा अन्य कहते हैं कि-द्रव्यादि छः पदार्थों में से एक में दूसरे का अभाव वाला ही अभाव है । किन्हीं का कथन है कि समवाय से अन्य