वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
by महर्षि कणाद
Source: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (origin)
Page 91 of 160
Read in contextचतुर्थाध्याय २ आह्निक ८९ प्राण विषय, इस रीति से तीन प्रकार का वायु है । यद्यपि प्राण एक है तथापि हृदय आदि भिन्न २ स्थानों में रहने से और मुख तथा नासिका आदि द्वारों में होकर निकलने से प्राण दश प्रकार का कहाता है- १-प्राण, २-अपान ३-समान ४-उदान ५-व्यान ६-नाग ७-कूर्म ८-कृकल ९-देवदत्त और १०-धनञ्जय, ये सब १० प्राण के भेद हैं जैसा कि एक श्लोक में कहा गया है- हृदि प्राणो गुदेऽपानः समानो नाभिसंस्थितः । उदानः कण्ठदेशस्थो व्यानः सर्वशरीरगः ॥ १ ॥ हृदय में प्राण, गुदा में अपान, नाभि में समान, कण्ठ में उदान और समस्त शरीर में व्यान नाम से प्राण रहता है तथा उगलने का काम करने वाला वायु नाग कहाता है, पलक मारने का कूर्म, भूख लगाने का कृकल, जम्भाई लेने का देवदत्त और पुष्टि करने वाला प्राण वायु धनञ्जय कहाता है ॥ आकाश के दो भेद ये हैं-१ कर्णपुट में रहनेवाला आकाश श्रोत्रेन्द्रिय है, तथा २-बाहर का समस्त आकाश विषय है । काल एक प्रकार का है परन्तु उस के भेद क्षण, निमेष, काष्ठा, कला, मुहूर्त, दिन, रात्रि, सप्ताह, पक्ष, मास, वर्ष, युग और कल्पभेद से अनेक प्रकार के हैं, सो सब विषयरूप हैं, इस लिये काल एक प्रकार का है ॥ दिशा भी पूर्व, आग्नेय, दक्षिण, नैर्ऋत्य, पश्चिम, वायव्य, उत्तर और ईशान भेद से यद्यपि आठ प्रकार की हैं और किन्हीं के मत में ऊपर और नीचे की दो मिलाकर १० प्रकार की हैं परन्तु वे सब केवल एक विषय रूप हैं, शरीररूप वा इन्द्रियरूप नहीं होतीं ॥ मन केवल एक प्रकार का इन्द्रियरूप है, शरीररूप और विषयरूप नहीं ॥१॥ प्रश्न-पूर्व सूत्र में जो पृथिवी आदि कार्य द्रव्यों को शरीर इन्द्रिय विषय भेद से तीन प्रकार का कहा गया है, वह वह पृथिवी आदि कार्य द्रव्य पाञ्च महाभूतों से एक एक बनता है अथवा केवल एकला एकला ही है ? उत्तर- १७२-प्रत्यक्षाऽप्रत्यक्षाणां संयोगस्याऽप्रत्य- क्षत्वात् पञ्चात्मकं न विद्यते ॥ २ ॥