वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
by महर्षि कणाद
Source: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (origin)
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Read in contextचतुर्थाध्याय २ आन्हिक २९ ( धर्मविशेषात् ) विशेष धर्म से ( च ) और विशेष अधर्म से ॥ सृष्टि के आरम्भ में जो जीव भिन्न २ देहों को धारण करते हैं, उन्हों ने पूर्व कल्प में भिन्न २ प्रकार के धर्म विशेष और अधर्म विशेष किये थे, बस उन्हीं धर्माऽधर्मों के विशेष ( भिन्न २ ) होने से मनुष्य पशु पक्षी आदि एक दूसरे से विलक्षण शरीर उत्पन्न हुये ॥ अर्थात् सातवें सूत्र में कहा हुवा ही एक हेतु नहीं है; जिस से दिशा और देश का पूर्व कारण में भेद न होने से सब के एकसे देह उत्पन्न होने की शङ्का बन सकती, किन्तु दूसरा हेतु भी जो इस आठवें सूत्र में कहा गया है, वह धर्म और अधर्म विशेष है, क्योंकि सब जीवों के धर्म अधर्म आपस में समान नहीं होते, इस लिये धर्माऽधर्म के फल भोगने के लिये जो देह उन को दिये जाते हैं, वे सब भी एकसे नहीं होते किन्तु अपने २ किये हुए धर्मविशेष और अधर्मविशेष से सब को भिन्न २ प्रकार के देह मिलते हैं ॥ ८ ॥ सर्गारम्भ के शरीरों के अयोनिज होने में अन्य भी हेतु है । यथा- १७९-समाख्याभावाच्च ॥ ९ ॥ ( समाख्याभावात् ) प्रसिद्ध नाम पाये जाने से ( च ) भी ॥ अग्नि, वायु, रवि, भृगु, वशिष्ठ, गौतम, भरद्वाज, अङ्गिरा, जमदग्नि आदि कितने ही ऋषियों के नाम सदा से प्रसिद्ध हैं कि जिन का कोई पिता वा माता परमात्मा के अतिरिक्त नहीं था, इस ऐतिहासिक प्रमाण से भी साङ्कल्पिक अयोनिज शरीर सिद्ध होते हैं ॥ ९ ॥ क्योंकि- १८०-संज्ञाया आदित्वात् ॥ १० ॥ ( संज्ञायाः ) संज्ञा के ( आदित्वात् ) सब से प्रथम होने से ॥ अग्नि, वायु, रवि आदि की संज्ञा ( नाम ) सब से प्रथम पाये जाते हैं, उन से पूर्व उन के पिता आदि का नाम नहीं पाया जाता, इस से उन को अयोनिज मानना बनता है ॥ १० ॥ १८१-सन्त्यऽयोनिजाः ॥ ११ ॥ ( अयौनिजाः ) बिना योनि से उत्पन्न हुवे ( सन्ति ) सिद्ध हैं ॥ छठे सूत्र से दशवें पर्यन्त सूत्रों में वर्णित और प्रमाणित अयोनिज शरीर अवश्य होते हैं, यह सिद्ध हुवा ॥ ११ ॥