वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)
Vaiyakarana Siddhanta Kaumudi of Bhattoji Dikshita with Commentary
by भट्टोजि दीक्षित (टीकाकार: वासुदेव दीक्षित एवं ज्ञानेन्द्र सरस्वती)
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Read in contextअनृष्यानन्तर्ये बिदादिभ्योऽञ् ॥ ४ । १ । १०४ ॥ बिद उर्व कश्यप कुशिक भरद्वाज उपमन्यु किलात कन्दर्प [ किंदर्भ ] विश्वानर [ ऋष्टषेण ] ऋष्टिषेण ऋतभाग हर्यश्व प्रियक आपस्तम्ब कूर्चवार शरद्वत् शौनक [ शुनक् ] धेनु गोपवन शिग्रु बिन्दु (भोजक) भाजन [ शमिक ] अश्वावतान श्यामाक श्यामक [ श्यावलि ] श्यापर्ण हरित किन्दास वह्य- स्क अर्कजूष [ अर्कलूप ] बध्य्रोग विष्णु वृद्ध प्रतिबोध [ रथीतर ] रथन्तर गविष्ठिर निषाद [ शबर अनस ] मठर [ मृडाकु ] सृपाकु मृदु पुनर्भूर् पुत्र दुहितृ ननान्दृ । परस्त्री परशु च ॥ इति बिदादिः ॥ १३ ॥ गर्गादिभ्यो यञ् । ४ । १ । १०५ ॥ गर्ग वत्स । वाजासे । संकृति अज व्याघ्रपात् विदभृत् प्राचीनयोग ( अगस्ति ) पुलस्ति चमस रेभ अग्निवेश शङ्ख शट शक धूम एक अवट मनस् धनंजय वृक्ष विश्वावसु जरमाण लोहित शंसित बभ्रु वल्गु मण्डु शङ्ख लिगु गुहल मन्तु मङ्क्षु अलिगु जिगीषु मनु तन्तु मनायी सूनु कथक कन्थक ऋक्ष तृक्ष ( वृक्ष ) [ तनु ] तरुक्ष तलुक्ष तण्ड वतण्ड कपिकत ( कपि कत ) कुरुकत अनडुह कण्व शकल गोकक्ष अगस्त्य कुण्डिनी यज्ञवल्क पर्णवल्क अभयजात विरोहित वृषगण रहूगण शण्डिल वर्णक ( चणक ) चुलुक मुद्गल मुसल जमदग्नि पराशर जतुकर्ण ( जातूकण्र्ण ) महित मन्त्रित अश्मरथ शर्कराक्ष पूतिमाष स्थूरा अदरक्र ( अररक ) एलाक पिङ्गल कृष्ण गोलन्द उलूक तितिक्ष भिषज ( भिषज् ) [ भिष्णज ] भडित भण्डित दल्भ चेकित चिकित्सित देवहू इन्द्रहू एकल पिप्पलू बृहदग्नि [ सुलोहिन् ] सुलाभिन् उक्थ कुटीगु ॥ इति गर्गादिः ॥ १४ ॥ . अश्वादिभ्यः फञ् । ४ । १ । ११० ॥ अश्व अश्मन् शङ्ख शूद्रक विद् पुट रोहिण खर्जूर ( खजूर ) [ खञ्जार वस्त्र ] पिजूल भडिल भण्डिल भडित भण्डित [ प्रकृत रामोद ] क्षान्त [ काश तीक्ष्ण गोलाङ्क अर्क स्वर स्फुट चक्र श्रविष्ठ ] पविन्द पवित्र गोमिन् श्याम धूम धूम्र वाग्मिन् विश्वानर कुट । शप आत्रेये । जन जड खड ग्रीष्म अर्ह- कित विशांप विशाल गिरि चपल चुप दासक वैल्य ( वैन्य ) प्राच्य [ धर्म्य ] आनडुह्य । पुंसि जाते । अर्जुन [ प्रहृत ] सुमनस् दुर्मनस् मन ( मनस् ) [ प्रान्त ] ध्वन । आत्रेय भरद्वाजे । भरद्वाज आत्रेये । उत्स आतप कितव [ वद् धन्य पाद ] शिव खदिर ॥ इत्यश्वादिः ॥ १५ ॥ शिवादिभ्योऽण् । ४ । १ । ११२ ॥ शिव प्रोष्ठ प्रोष्ठक चण्ड जम्भ भूरि दण्ड कुठार ककुम् (ककुभा) अनभिम्लान कोहित सुख संधि मुनि ककुत्स्थ कहोड कोहड कहुय कहय रोध कपिञ्जल ( कुपिञ्जल ) खञ्जन वतण्ड तृणकर्ण क्षीरह्रद जलह्रद परिल [ पथिक ] पिष्ट हैहय ( पार्थिका ) गोपिका कपिलिका जटिलिका बधिरिका मञ्जीरक [ मजिरक ] वृष्णिक खजार खञ्जाल [ कर्मार ] रेख लेख आलेखन विश्रवण रवण वर्तनाक्ष ग्रीवाक्ष [ विटप पिटक ] विटाक तूक्षाक नभाक ऊर्णनाभ जरत्कारु [ पृथा उत्क्षेप ] पुरोहितिका सुरोहितिका सुरोहिंका आर्यश्वेत ( अर्थश्वेत ) सुपिष्ट मसुरकर्ण मयूरकर्ण [ खर्जूरकर्ण ]