वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)
Vaiyakarana Siddhanta Kaumudi of Bhattoji Dikshita with Commentary
by भट्टोजि दीक्षित (टीकाकार: वासुदेव दीक्षित एवं ज्ञानेन्द्र सरस्वती)
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Read in context(६४) गणपाठे- ५ काश पाश अश्वत्थ पलाश पीयूक्षा चरण वास नड वन कर्दम कच्छूल कङ्कट गुड बिस तृण कर्पूर वर्बर मधुर ग्रह कपित्थ जतु सीपाल ॥ इति काशादिः ॥ ४३ ॥ ६ तृण नड मूल वन पर्ण वर्ण वरण बिल पुल फल अर्जुन अर्ण सुवर्ण बल चरण बुस ॥ इति तृणादिः ॥ ४७ ॥ ७ प्रेक्षा फलका (हलका) बन्धुका ध्रुवका क्षिपका न्यग्रोध इक्ट कङ्कट सङ्कट कट कूप बुक पुट मह परिवाप यवषि ध्रुवका गर्त कूपक हिरण्य ॥ इति प्रेक्षादिः ॥ ४८ ॥ ८ अश्मन् यूथ ऊष मीननद दर्भ वृन्द गुद खण्ड नग शिखा कीट पाम कन्द कान्द कुल गह्र गुण कुण्डल पीन गुह ॥ इत्यश्मादिः ॥ ४६ ॥ ९ सखि अग्निदत्त वायुदत्त सखिदत्त [गोपिल] मल्लपाल (मल्ल पाल) चक्र चक्रवाल छगल अशोक करवीर वासव वीर पूर वज्र कुशीकर शीहर (सीहर) सरक सरस समर समल सुरस रोह तमाल कदल ससल ॥ इति सख्यादिः ॥ ४७ ॥ १० सङ्काश कपिल कश्मीर [समीर] सूरसेन सरक सूर [सुपथिन्पन्थ च] यूप (यूथ) अंश अङ्ग नासा पलित अनुनाश अश्मन् कूट मलिन दश कुम्भ शीर्ष चिरन्त (विरत) समल सीर पञ्जर मन्थ नल रोमन् लोमन पुलिन सुरारि कटिप सकर्णक वृष्टि तीर्थ अगस्ति त्रिकर नासिका ॥ इति सङ्काशादिः ॥ ४८ ॥ ११ बल चुल नल दल वट लकुल उरल पुख (पुल) मूल उलडुल (उल डुल) वन- कुल ॥ इति बलादिः ॥ ४९ ॥ १२ तुक्ष पक्ष तुष कुण्ड अण्ड कम्बलिका वलिक चित्र अस्ति । पथः पन्थ च । कुम्भ सीरक सरक सकल सरस समल अतिश्वन् रोमन् लोमन् हस्तिन् मकर लोमक शीर्ष निवात पाक सहक (सिंहक) अङ्कुश सुवर्णक हंसक हिंसक कुत्स बिल खिल यमल हस्त कला सकर्णक ॥ इति पक्षादिः ॥ ५० ॥ १३ कर्ण वसिष्ठ अर्क अर्कलूष द्रुपद आनडुह्य पाञ्चजन्य स्फिग (स्फिज्) कुम्भी कुन्ती जीवन् जीवन्त कुलिश आण्डीवत् (आण्डीवत) जव जैत्र आकन (आनक) ॥ इति कर्णादिः ॥ ५१ ॥ १४ सुतंगम मुनिचित विप्रचित महाचित्त महापुत्र स्वन श्वेत गंडिक (खंडिक) शुक्र विप्र बीजवापिन् (बीज वापिन्) अर्जुन श्वन् अजिर जीव खंडित कर्ण विग्रह ॥ इति सुतंगमादिः ॥ ५२ ॥ १५ प्रगदिन् मगदिन् मददिन् कवल खंडित गदित चूडार मडार मन्दार कोविदार ॥ इति प्रगद्यादिः ॥ ५३ ॥ १६ वराह पलाश (पलाश) शेरीष (शिरीष) पिनद्ध निबद्ध बलाह स्थूल विदग्ध [विजग्ध] विभ्रम [विभ्रष्ट] बाहू खदिर शर्करा ॥ इति वराहादिः ॥ ५४ ॥