वामन पुराण
Vamana Purana
by महर्षि वेदव्यास
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Read in context१०८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २० नादेन चैवाशनिसंनिभेन विषाणकोट्या त्वपरान् प्रमथ्य। दुद्राव सिंहं युधि हन्तुकामः ततोऽम्बिका क्रोधवशं जगाम ॥ ४० ततः स कोपादथ तीक्ष्णशृङ्गः क्षिप्रं गिरीन् भूमिमशीर्णयच्च। संक्षोभयंस्तोयनिधीन् घनांश्च विध्वंसयन् प्राद्रवताथ दुर्गाम् ॥ ४१ सा चाथ पाशेन बबन्ध दुष्टं स चाप्यभूत् क्लिन्नकटः करीन्द्रः। करं प्रचिच्छेद च हस्तिनोऽग्रं स चापि भूयो महिषोऽभिजातः ॥ ४२ ततोऽस्य शूलं व्यसृजन्मृडानी स शीर्णमूलो न्यपतत् पृथिव्याम्। शक्तिं प्रचिक्षेप हुताशदत्तां सा कुण्ठिताग्रा न्यपतन्महर्षे ॥ ४३ चक्रं हरेर्दानवचक्रहन्तुः क्षिप्तं त्वचक्रत्वमुपागतं हि। गदां समाविध्य धनेश्वरस्य क्षिप्ता तु भग्ना न्यपतत् पृथिव्याम् ॥ ४४ जलेशपाशोऽपि महासुरेण विषाणतुण्डाग्रखुरप्रणुन्नः । निरस्य तत्कोपितया च मुक्तो दण्डस्तु याम्यो बहुखण्डतां गतः ॥ ४५ वज्रं सुरेन्द्रस्य च विग्रहेऽस्य मुक्तं सुसूक्ष्मत्वमुपाजगाम। संत्यज्य सिंहं महिषासुरस्य दुर्गाऽधिरूढा सहसैव पृष्ठम् ॥ ४६ पृष्ठस्थितायां महिषासुरोऽपि पोप्लूयते वीर्यमदान्मृदान्याम्। सा चापि पद्भ्यां मृदुकोमलाभ्यां ममर्द तं क्लिन्नमिवाजिनं हि ॥ ४७ स मृद्यमानो धरणीधराभो देव्या बली हीनबलो बभूव। और अपने बिजलीकी कड़कके समान नाद एवं सींगोंकी नोकसे शेष भूतोंको व्याकुल कर रणक्षेत्रमें सिंहको मारने दौड़ा। इससे अम्बिकाको बड़ा क्रोध हुआ। फिर वह क्रुद्ध महिष अपने नुकीले सींगोंसे जल्दी-जल्दी पर्वतों एवं पृथ्वीको विदीर्ण करने लगा। वह समुद्रको क्षुब्ध करते तथा मेघोंको तितर-बितर करते हुए दुर्गाकी ओर दौड़ा। इसपर उन देवीने उस दुष्टको पाशसे बाँध दिया, पर वह झटसे मदसे भींगे कपोलोंवाला गजराज बन गया। (तब) देवीने उस गजके शुण्डका अगला भाग काट डाला। अब उसने पुनः भैंसेका रूप धारण कर लिया। महर्षि नारदजी! उसके बाद देवीने उसके ऊपर शूल फेंका जो टूटकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। तत्पश्चात् उन्होंने अग्निसे प्राप्त हुई शक्ति फेंकी, किंतु वह भी टूटकर गिर पड़ी ॥ ४०-४३ ॥ दानवसमूहको मारनेवाला विष्णुप्रदत्त चक्र भी फेंके जानेपर व्यर्थ हो गया। देवीने कुबेरद्वारा दी गयी गदा भी घुमाकर फेंकी, पर वह भी भग्न होकर पृथ्वीपर गिर पड़ी। महिषने वरुणके पाशको भी अपने सींग, थूथना एवं खुरके प्रहारसे विफल कर दिया। फिर कुपित होकर देवीने यमदण्डको छोड़ा, पर उसे भी उसने तोड़कर कई खण्ड-खण्ड कर डाला। उसके शरीरपर देवीद्वारा छोड़ा गया इन्द्रका वज्र भी छोटे-छोटे टुकड़ोंमें बिखर गया। अब दुर्गाजी सिंहको छोड़कर सहसा महिषासुरकी पीठपर ही चढ़ गयीं। देवीके पीठपर चढ़ जानेपर भी महिषासुर अपने बलके मदसे उछलता रहा। देवी भी अपने मृदुल तथा कोमल चरणोंसे भींगे मृगचर्मके समान उसकी पीठको मर्दन करती गयीं ॥ ४४-४७ ॥ अन्तमें देवीद्वारा कुचला जाता हुआ पर्वताकार बलवान् महिष बलशून्य हो गया। तब देवीने अपने