BharatKosha
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished489 pages

Page 121 of 489

Read in context
Page 121

अध्याय २१ ] देवीके पुनराविर्भाव-सम्बन्धी प्रश्नोत्तर; संवरण-तपतीका विवाह १११

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
य एते पितरो दिव्यास्त्वग्निष्वात्तेति विश्रुताः ।<br>अमीषां मानसी कन्या मेना नाम्नाऽस्ति देवताः ॥ १६<br><br>तामाराध्य महातिथ्यां श्रद्धया परयाऽमराः ।<br>प्रार्थयध्वं सतीं मेनां प्रालेयाद्रेरिहार्थतः ॥ १७<br><br>तस्यां सा रूपसंयुक्ता भविष्यति तपस्विनी ।<br>दक्षकोपाद् यया मुक्तं मलवज्जीवितं प्रियम् ॥ १८<br><br>सा शङ्करात् स्वतेजोऽंशं जनयिष्यति यं सुतम् ।<br>स हनिष्यति दैत्येन्द्रं महिषं सपदानुगम् ॥ १९<br><br>तस्माद् गच्छत पुण्यं तत् कुरुक्षेत्रं महाफलम् ।<br>तत्र पृथूदके तीर्थे पूज्यन्तां पितरोऽव्ययाः ॥ २०<br><br>महातिथ्यां महापुण्ये यदि शत्रुपराभवम् ।<br>जिहासतात्मनः सर्वे इत्थं वै क्रियतामिति ॥ २१देवगण ! जो ये 'अग्निष्वात्त' नामसे प्रसिद्ध दिव्य पितर हैं, उनकी मेना नामकी एक मानसी कन्या है। देववृन्द ! आपलोग अत्यन्त श्रद्धासे अमावास्याको सती मेनाकी (यथाविधि) आराधना करें तथा उनसे हिमालयकी पत्नी बननेके लिये प्रार्थना करें। उन्हीं मेनासे (एक) तपस्विनी रूपवती कन्या उत्पन्न होगी, जिसने दक्षके ऊपर कोपकर अपने प्रिय जीवनका मलके समान परित्याग कर दिया था। वे शिवजीके तेजके अंशरूप जिस पुत्रको उत्पन्न करेंगी वह दैत्योंमें श्रेष्ठ महिषको उसकी सेनासहित मार डालेगा ॥ १६–१९ ॥<br><br>अतः आपलोग महान् फल देनेवाले, पवित्र कुरुक्षेत्रमें जायें एवं वहाँ 'पृथूदक' नामके तीर्थमें नित्य ही अग्निष्वात्त नामके पितरोंकी पूजा करें। यदि आपलोग अपने शत्रुंकी पराजय चाहते हैं तो सब कुछ छोड़कर अमावास्याको उस परम पवित्र तीर्थमें इसी (निर्दिष्ट) कार्यको सम्पन्न करें ॥ २०–२१ ॥
पुलस्त्य उवाच<br>इत्युक्ता वासुदेवेन देवाः शक्रपुरोगमाः ।<br>कृताञ्जलिपुटा भूत्वा पप्रच्छुः परमेश्वरम् ॥ २२पुलस्त्यजी बोले— भगवान् विष्णुके ऐसा कहनेपर इन्द्र आदि देवताओंने हाथ जोड़कर उन परमात्मासे पूछा — ॥ २२ ॥
देवा ऊचुः<br>कोऽयं कुरुक्षेत्र इति यत्र पुण्यं पृथूदकम् ।<br>उद्भवं तस्य तीर्थस्य भगवान् प्रब्रवीतु नः ॥ २३<br><br>केयं प्रोक्ता महापुण्या तिथीनामुत्तमा तिथिः ।<br>यस्यां हि पितरो दिव्याः पूज्याऽस्माभिः प्रयत्नतः ॥ २४<br><br>ततः सुराणां वचनान्मुरारिः कैटभार्दनः ।<br>कुरुक्षेत्रोद्भवं पुण्यं प्रोक्तवांस्तां तिथीमपि ॥ २५देवताओंने पूछा— भगवन्! यह कुरुक्षेत्र तीर्थ कौन है, जहाँ पृथूदक तीर्थ है ? आप हमलोगोंको उस तीर्थकी उत्पत्तिके विषयमें बतायें। और, वह पवित्र उत्तम तिथि कौन-सी है जिसमें हम सब दिव्य पितरोंकी पूजा प्रयत्नपूर्वक कर सकें। तब भगवान् विष्णुने देवताओंकी प्रार्थना सुनकर उनसे कुरुक्षेत्रकी पवित्र उत्पत्ति तथा उस उत्तम तिथिका भी वर्णन किया (जिसमें पूजा करनेकी बात कही थी) ॥ २३–२५ ॥
श्रीभगवानुवाच<br>सोमवंशोद्भवो राजा ऋक्षो नाम महाबलः ।<br>कृतस्यादौ समभवदृक्षात् संवरणोऽभवत् ॥ २६<br><br>स च पित्रा निजे राज्ये बाल एवाभिषेचितः ।<br>बाल्येऽपि धर्मनिरतो मद्भक्तश्च सदाऽभवत् ॥ २७<br><br>पुरोहितस्तु तस्यासीद् वसिष्ठो वरुणात्मजः ।<br>स चास्याध्यापयामास साङ्गान् वेदानुदारधीः ॥ २८<br><br>ततो जगाम चारण्यं त्वनध्याये नृपात्मजः ।<br>सर्वकर्मसु निक्षिप्य वसिष्ठं तपसां निधिम् ॥ २९श्रीभगवान्‌ने कहा— सत्ययुगके प्रारम्भमें सोमवंशमें ऋक्षनामके एक महाबलवान् राजा उत्पन्न हुए। उन ऋक्षसे संवरणकी उत्पत्ति हुई। पिताने उसे बचपनमें ही राज्यपर अभिषिक्त कर दिया। वह बाल्यकालमें भी सदा धर्मनिष्ठ एवं मेरा भक्त था। वरुणके पुत्र वसिष्ठ उसके पुरोहित थे। उन्होंने उसे अङ्गोंसहित सम्पूर्ण वेदोंको पढ़ाया। एक दिनकी बात है कि अनध्याय (छुट्टी) रहनेपर वह राजपुत्र (संवरण) तपोनिधि वसिष्ठको सभी कार्य सौंपकर वनमें चला गया ॥ २६–२९ ॥