वामन पुराण
Vamana Purana
by महर्षि वेदव्यास
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Read in contextअध्याय २९ ] बलिका पितामह प्रह्लादसे प्रश्न, अदितिके गर्भमें वामनागमन १३५ तत्संजातं मया सर्वं यदर्थं भवतामियम्। तेजसो हानिरुत्पन्ना शृण्वन्तु तदशेषतः ॥ १६ देवदेवो जगद्योनिरयोनिर्जगदादिजः । अनादिरादिर्विश्वस्य वरेण्यो वरदो हरिः ॥ १७ परावराणां परमः परापरसतां गतिः । प्रभुः प्रमाणं मानानां सप्तलोकगुरोर्गुरुः । स्थितिं कर्तुं जगन्नाथं सोऽचिन्त्यो गर्भतां गतः ॥ १८ प्रभुः प्रभूणां परमः पराणा- मनादिमध्यो भगवाननन्तः । त्रैलोक्यमंशेन सनाथमेकः कर्तुं महात्माऽदितिजोऽवतीर्णः ॥ १९ न यस्य रुद्रा न च पद्मयोनि- र्नेन्द्रो न सूर्येन्दुमरीचिमिश्राः । जानन्ति दैत्याधिप यत्स्वरूपं स वासुदेवः कलयावतीर्णः ॥ २० यमक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यं ज्ञानविधूतपापाः । यस्मिन् प्रविष्टा न पुनर्भवन्ति तं वासुदेवं प्रणमामि देवम् ॥ २१ भूतान्यशेषाणि यतो भवन्ति यथोर्मयस्तोयनिधेरजस्रम् । लयं च यस्मिन् प्रलये प्रयान्ति तं वासुदेवं प्रणतोऽस्म्यचिन्त्यम् ॥ २२ न यस्य रूपं न बलं प्रभावो न च प्रतापः परमस्य पुंसः । विज्ञायते सर्वपितामहाद्यै- स्तं वासुदेवं प्रणमामि नित्यम् ॥ २३ रूपस्य चक्षुर्ग्रहणे त्वगेषा स्पर्शग्रहित्री रसना रसस्य । घ्राणं च गन्धग्रहणे नियुक्तं न घ्राणचक्षुः श्रवणादि तस्य ॥ २४ स्वयंप्रकाशः परमार्थतो यः सर्वेश्वरो वेदितव्यः स युक्त्या। शक्यं तमीड्यमनघं च देवं ग्राह्यं नतोऽहं हरिमीशितारम् ॥ २५ (दैत्यो!) मैंने तुमलोगोंकी कान्तिहीनताके (वास्तविक) सब कारणको - अच्छी तरहसे समझ लिया है। (अब) उसे तुमलोग भलीभाँति सुनो। देवोंके देव, जगद्योनि, (विश्वको उत्पन्न करनेवाले) किंतु स्वयं अयोनि, विश्वके प्रारम्भमें विद्यमान पर स्वयं अनादि, फिर भी विश्वके आदि, वर देनेवाले वरणीय हरि, सर्वश्रेष्ठोंमें भी परम (श्रेष्ठ), बड़े-छोटे सज्जनोंकी गति, मानोंके भी प्रमाणभूत प्रभु, सातों लोकोंके गुरुओंके भी गुरु एवं चिन्तनमें न आने योग्य विश्वके स्वामी मर्यादा (धर्महेतु)-की स्थापना करनेके लिये (अदितिके) गर्भमें आ गये हैं। प्रभुओंके प्रभु, श्रेष्ठोंमें श्रेष्ठ, आदि-मध्यसे रहित, अनन्त भगवान् तीनों लोकोंको सनाथ करनेके लिये अदितिके पुत्रके रूपमें अंशावतारस्वरूपसे अवतीर्ण हुए हैं ॥ १६-१९॥ दैत्यपते ! जिन वासुदेव भगवान्के वास्तविक स्वरूपको रुद्र, ब्रह्मा, इन्द्र, सूर्य, चन्द्र एवं मरीचि आदि श्रेष्ठ पुरुष नहीं जानते, वे ही वासुदेव भगवान् अपनी एक कलासे अवतीर्ण हुए हैं। वेदके जाननेवाले जिन्हें अक्षर कहते हैं तथा ब्रह्मज्ञानके होनेसे जिनके पाप नष्ट हो गये हैं - ऐसे निष्पाप शुद्ध प्राणी जिनमें प्रवेश पाते हैं और जिनके भीतर प्रविष्ट हुए लोग पुनः जन्म नहीं लेते - ऐसे उन वासुदेव भगवान्को मैं प्रणाम करता हूँ। समुद्रकी लहरोंके समान जिनसे समस्त जीव निरन्तर उत्पन्न होते रहते हैं तथा प्रलयकालमें जिनके भीतर विलीन हो जाते हैं, उन अचिन्त्य वासुदेवको मैं प्रणाम करता हूँ। ब्रह्मा आदि जिन परम पुरुषके रूप, बल, प्रभाव और प्रतापको नहीं जान पाते उन वासुदेवको मैं नित्य प्रणाम करता हूँ ॥ २०-२३ ॥ जिन परमेश्वरने रूप देखनेके लिये आँखोंको, स्पर्शज्ञानके लिये त्वचाको, खट्टे-मीठे स्वाद लेनेके लिये जीभको और सुगन्ध-दुर्गन्ध सूंघनेके लिये नाकको नियत किया है; पर स्वयं उनके नाक, आँख और कान आदि नहीं हैं। जो वस्तुतः स्वयं प्रकाशस्वरूप हैं, वे सर्वेश्वर युक्ति के द्वारा (कुछ-कुछ) जाने जा सकते हैं; उन सर्वसमर्थ, स्तुतिके योग्य, किसी भी प्रकारके मलसे रहित, (भक्तिसे) ग्राह्य, ईश हरिदेवको मैं प्रणाम करता हूँ।