वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished489 pages
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| अध्याय ३३ ] | सरस्वती नदीका कुरुक्षेत्रमें प्रवाहित होना और कुरुक्षेत्रमें निवास करनेका महत्त्व | १५१ |
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| एवं स्तुता तदा देवी विष्णोर्जिह्वा सरस्वती।<br>प्रत्युवाच महात्मानं मार्कण्डेयं महामुनिम्।<br>यत्र त्वं नेष्यसे विप्र तत्र यास्याम्यतन्द्रिता॥ २३ | इस प्रकार स्तुति किये जानेपर विष्णुकी जीभरूपिणी सरस्वतीने महामुनि महात्मा मार्कण्डेयसे कहा—हे विप्र! तुम मुझे जहाँ ले जाओगे, मैं वहीं आलस्य छोड़कर चली जाऊँगी॥ २१—२३॥ |
| मार्कण्डेय उवाच<br>आद्यं ब्रह्मसरः पुण्यं ततो रामह्रदः स्मृतः।<br>कुरुणा ऋषिणा कृष्टं कुरुक्षेत्रं ततः स्मृतम्।<br>तस्य मध्येन वै गाढं पुण्या पुण्यजलावहा॥ २४ | मार्कण्डेयने कहा—आरम्भमें (इसका) पवित्र नाम ब्रह्मसर था, फिर रामह्रद प्रसिद्ध हुआ एवं उसके बाद कुरु ऋषिद्वारा कृष्ट होनेसे कुरुक्षेत्र कहा जाने लगा। (अब) उसके मध्यमें अत्यन्त पवित्र जलवाली गहरी सरस्वती प्रवाहित हों॥ २४॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें बत्तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ३२ ॥
तैंतीसवाँ अध्याय
सरस्वती नदीका कुरुक्षेत्रमें प्रवाहित होना और कुरुक्षेत्रमें निवास करने तथा तीर्थमें स्नान करनेका महत्त्व
</div>| लोमहर्षण उवाच<br>इत्युषेर्वचनं श्रुत्वा मार्कण्डेयस्य धीमतः।<br>नदी प्रवाहसंयुक्ता कुरुक्षेत्रं विवेश ह॥ १<br><br>तत्र सा रन्तुकं प्राप्य पुण्यतोया सरस्वती।<br>कुरुक्षेत्रं समाप्लाव्य प्रयाता पश्चिमां दिशम्॥ २<br><br>तत्र तीर्थसहस्राणि ऋषिभिः सेवितानि च।<br>तान्यहं कीर्तयिष्यामि प्रसादात् परमेष्ठिनः॥ ३<br><br>तीर्थानां स्मरणं पुण्यं दर्शनं पापनाशनम्।<br>स्नानं मुक्तिकरं प्रोक्तमपि दुष्कृतकर्मणः॥ ४ | लोमहर्षणने कहा— बुद्धिमान् मार्कण्डेय ऋषिके इस उपर्युक्त वचनको सुनकर प्रवाहसे भरी हुई सरस्वती नदी कुरुक्षेत्रमें प्रविष्ट हुई। वह पवित्रसलिला सरस्वती नदी वहाँ रन्तुकमें जाकर कुरुक्षेत्रको जलसे प्लावित करती हुई, जो पश्चिम दिशाकी ओर चली गयी, वहाँ (कुरुक्षेत्रमें) हजारों तीर्थ ऋषियोंसे सेवित हैं। परमेष्ठी (ब्रह्मा)-के प्रसादसे मैं उनका वर्णन करूँगा। पापियोंके लिये भी तीर्थोंका स्मरण पुण्यदायक, उनका दर्शन पापनाशक और स्नान मुक्तिदायक कहा गया है (पुण्यशालियोंके लिये तो कहना ही क्या है) ॥ १—४॥ |
| ये स्मरन्ति च तीर्थानि देवताः प्रीणयन्ति च।<br>स्नान्ति च श्रद्दधानाश्च ते यान्ति परमां गतिम्॥ ५ | जो श्रद्धापूर्वक तीर्थोंका स्मरण करते हैं और उनमें स्नान करते हैं तथा देवताओंको प्रसन्न करते हैं, वे परम गति (मोक्ष)-को प्राप्त करते हैं। |
| अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।<br>यः स्मरेत कुरुक्षेत्रं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥ ६ | (मनुष्य) अपवित्र हो या पवित्र अथवा किसी भी अवस्थामें पड़ा हुआ हो, यदि कुरुक्षेत्रका स्मरण करे तो वह बाहर तथा भीतरसे (हर प्रकारसे) पवित्र हो जाता है। |
| कुरुक्षेत्रं गमिष्यामि कुरुक्षेत्रे वसाम्यहम्।<br>इत्येवं वाचमुत्सृज्य सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ७ | 'मैं कुरुक्षेत्रमें जाऊँगा और मैं कुरुक्षेत्रमें निवास करूँगा'—इस प्रकारका वचन कहनेसे (भी) मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। |