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वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished489 pages

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Page 170
१६०श्रीवामनपुराण[ अध्याय ३६
प्राणायामैर्निह॑रन्ति स्वलोमानि द्विजोत्तमाः।<br>पूतात्मानश्च ते विप्राः प्रयान्ति परमां गतिम्॥ ४८<br><br>दशाश्वमेधिकं चैव तत्र तीर्थं सुविश्रुतम्।<br>तत्र स्नात्वा भक्तियुक्तस्तदेव लभते फलम्॥ ४९<br><br>ततो गच्छेत श्रद्धावान् मानुषं लोकविश्रुतम्।<br>दर्शनात् तस्य तीर्थस्य मुक्तो भवति किल्बिषैः॥ ५०<br><br>पुरा कृष्णमृगास्तत्र व्याधेन शरपीडिताः।<br>विगाह्य तस्मिन् सरसि मानुषत्वमुपागताः॥ ५१<br><br>ततो व्याधाश्च ते सर्वे तानपृच्छन् द्विजोत्तमान्।<br>मृगा अनेन वै याता अस्माभिः शरपीडिताः॥ ५२<br><br>निमग्नास्ते सरः प्राप्य क्व ते याता द्विजोत्तमाः।<br>तेऽब्रुवंस्तत्र वै पृष्टा वयं ते च द्विजोत्तमाः॥ ५३<br><br>अस्य तीर्थस्य माहात्म्यान्मानुषत्वमुपागताः।<br>तस्माद् यूयं श्रद्दधानाः स्नात्वा तीर्थे विमत्सराः॥ ५४<br><br>सर्वपापविनिर्मुक्ता भविष्यथ न संशयः।<br>ततः स्नाताश्च ते सर्वे शुद्धदेहा दिवं गताः॥ ५५<br><br>एतत् तीर्थस्य माहात्म्यं मानुषस्य द्विजोत्तमाः।<br>ये शृण्वन्ति श्रद्दधानास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्॥ ५६उस तीर्थमें वे प्राणायामोंके द्वारा अपने लोमोंका परित्याग करते हैं और वे पवित्रात्मा विप्रगण परम गतिको प्राप्त करते हैं। वहींपर परम प्रसिद्ध दशाश्वमेधिक तीर्थ है। भक्तिपूर्वक उसमें स्नान करनेसे पूर्वोक्त फलकी ही प्राप्ति होती है। फिर श्रद्धालु मनुष्यको लोक-प्रसिद्ध मानुषतीर्थमें जाना चाहिये। उस तीर्थका दर्शन करनेसे ही पापोंसे मुक्ति हो जाती है॥४६—५०॥<br><br>पूर्वकालमें व्याधद्वारा बाणसे विद्ध कृष्णमृग (काला हरिण) उस सरोवरमें स्नानकर मनुष्यत्वको प्राप्त हुए थे। उसके बाद उन सभी व्याधोंने उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे पूछा—द्विजोत्तमो! हमलोगोंद्वारा बाणसे पीडित मृग इस मार्गसे जाते हुए सरोवरमें निमग्न होकर कहाँ चले गये? उनके पूछनेपर उन्होंने उत्तर दिया—हम द्विजोत्तम वे (कृष्ण) मृग ही थे। इस तीर्थके माहात्म्यसे हम सब मनुष्य बन गये हैं। अतएव मत्सरसे रहित होकर श्रद्धापूर्वक इस तीर्थमें स्नान करनेसे तुमलोग निःसंदेह समस्त पापोंसे विनिर्मुक्त हो जाओगे। फिर स्नान करनेसे शुद्ध-देह होकर वे सभी (व्याध) स्वर्ग चले गये। द्विजोत्तमो! जो श्रद्धापूर्वक मानुष तीर्थके इस माहात्म्यको सुनते हैं, वे भी परम गतिको प्राप्त करते हैं॥ ५१—५६॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पैंतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३५॥


छत्तीसवाँ अध्याय

कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य एवं क्रमका अनुक्रान्त वर्णन

लोमहर्षण उवाच<br>मानुषस्य तु पूर्वेण क्रोशमात्रे द्विजोत्तमाः।<br>आपगा नाम विख्याता नदी द्विजिनषेविता॥ १<br>श्यामाकं पयसा सिद्धमाज्येन च परिप्लुतम्।<br>ये प्रयच्छन्ति विप्रेभ्यस्तेषां पापं न विद्यते॥ २<br>ये तु श्राद्धं करिष्यन्ति प्राप्य तामापगां नदीम्।<br>ते सर्वकामसंयुक्ता भविष्यन्ति न संशयः॥ ३<br>शंसन्ति सर्वे पितरः स्मरन्ति च पितामहाः।<br>अस्माकं च कुले पुत्रः पौत्रो वापि भविष्यति॥ ४लोमहर्षण बोले— द्विजोत्तमो! मानुषतीर्थके पूर्व दिशामें एक कोसपर द्विजोंसे पूजित 'आपगा' नामकी एक विख्यात नदी है। वहाँ साँवाके चावलको दूधमें सिद्धकर और उसमें घी मिलाकर जो ब्राह्मणको देते हैं, उनके पाप नहीं रह जाते। जो व्यक्ति उस आपगा नदीके तटपर जाकर श्राद्ध करेंगे, वे निःसंदेह समस्त (शुभ) कामनाओंसे पूर्ण होंगे। सभी पितर कहते हैं तथा पितामह लोग स्मरण करते हैं कि हमारे कुलमें कोई