वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished489 pages
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| १७४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४० |
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| ततः स चिन्तयामास ब्राह्मणस्य विचेष्टितम्।<br>पुरोहितेन संयुक्तो रत्नान्यादाय सर्वशः॥ ३२<br><br>प्रसादनार्थं विप्रस्य ह्यवकीर्णं ययौ तदा।<br>प्रसादितः स राज्ञा च तुष्टः प्रोवाच तं नृपम्॥ ३३<br><br>ब्राह्मणा नावमन्तव्याः पुरुषेण विजानता।<br>अवज्ञातो ब्राह्मणस्तु हन्यात् त्रिपुरुषं कुलम्॥ ३४<br><br>एवमुक्त्वा स नृपतिं राज्येन यशसा पुनः।<br>उत्थापयामास ततस्तस्य राज्ञे हिते स्थितः॥ ३५ | (राष्ट्रको क्षीण होते देख) उसने विचार किया और वह इसे ब्राह्मणका विकर्म जानकर (उस ब्राह्मणको) प्रसन्न करनेके लिये समस्त रत्नोंको लेकर पुरोहितके साथ अवकीर्णतीर्थमें गया (और उस) राजाने उन्हें प्रसन्न कर लिया। प्रसन्न होकर उन्होंने राजासे कहा — (राजन्!) विद्वान् मनुष्यको ब्राह्मणका अपमान नहीं करना चाहिये। अपमानित हुआ ब्राह्मण मनुष्यके कुलके तीन पुरुषों (पीढ़ियों)-का विनाश कर देता है। ऐसा कहकर उन्होंने पुनः राजाको राज्य एवं यशके साथ सम्पन्न कर दिया और वे उस राजाके हितकारी हो गये॥ ३२—३५॥ |
| तस्मिंस्तीर्थे तु यः स्नाति श्रद्दधानो जितेन्द्रियः।<br>स प्राप्नोति नरो नित्यं मनसा चिन्तितं फलम्॥ ३६<br><br>तत्र तीर्थं सुविख्यातं यायातं नाम नामतः।<br>यस्येह यजमानस्य मधु सुस्राव वै नदी॥ ३७<br><br>तस्मिन् स्नातो नरो भक्त्या मुच्यते सर्वकिल्बिषैः।<br>फलं प्राप्नोति यज्ञस्य अश्वमेधस्य मानवः॥ ३८<br><br>मधुस्रवं च तत्रैव तीर्थं पुण्यतमं द्विजाः।<br>तस्मिन् स्नात्वा नरो भक्त्या मधुना तर्पयेत् पितॄन्॥ ३९<br><br>तत्रापि सुमहत्तीर्थं वसिष्ठोद्वाहसंज्ञितम्।<br>तत्र स्नातो भक्तियुक्तो वासिष्ठं लोकमाप्नुयात्॥ ४० | उस (अवकीर्ण) तीर्थमें जो जितेन्द्रिय मनुष्य श्रद्धापूर्वक स्नान करता है, वह नित्य मनोऽभिलषित फल प्राप्त करता है। वहाँ 'यायात' (ययातिका तीर्थ) नामसे सुविख्यात तीर्थ है, जहाँ यज्ञ करनेवालेके लिये नदीने मधु बहाया था। उसमें भक्तिपूर्वक स्नान करनेसे मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है एवं उसे अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है। द्विजो! वहीं 'मधुस्रव' नामक पवित्र तीर्थ है। उसमें मनुष्यको भक्तिपूर्वक स्नान कर मधुसे पितरोंका तर्पण करना चाहिये। वहींपर 'वसिष्ठोद्वाह' नामक सुन्दर महान् तीर्थ है, वहाँ भक्तिपूर्वक स्नान करनेवाला व्यक्ति महर्षि वसिष्ठके लोकको प्राप्त करता है॥ ३६—४०॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें उन्तालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३९॥
चालीसवाँ अध्याय
वसिष्ठापवाह नामक तीर्थका उत्पत्ति-प्रसङ्ग
| ऋषय ऊचुः<br>वसिष्ठस्यापवाहोऽसौ कथं वै सम्बभूव ह।<br>किमर्थं सा सरिच्छ्रेष्ठा तमृषिं प्रत्यवाहयत्॥ १ | ऋषियोंने कहा (पूछा)— महाराज! वह वसिष्ठापवाह कैसे उत्पन्न हुआ? उस श्रेष्ठ सरिताने उन ऋषिको अपने प्रवाहमें क्यों बहा दिया था?॥ १॥ |
| लोमहर्षण उवाच<br>विश्वामित्रस्य राजर्षेर्वसिष्ठस्य महात्मनः।<br>भृशं वैरं बभूवेह तपःस्पर्द्धाकृते महत्॥ २ | लोमहर्षण बोले— (ऋषियो!) राजर्षि विश्वामित्र एवं महात्मा वसिष्ठमें तपस्याके विषयमें परस्पर चुनौती होनेके कारण बड़ी भारी शत्रुता हो गयी। |