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वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished489 pages

Page 187 of 489

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Page 187
अध्याय ४० ]वसिष्ठापवाह नामक तीर्थका उत्पत्ति-प्रसङ्ग१७७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दृष्ट्वा तोयं सरस्वत्या राक्षसा दुःखिता भृशम्।<br>ऊचुस्तान् वै मुनीन् सर्वान् दैन्ययुक्ताः पुनः पुनः॥ ३१<br><br>वयं हि क्षुधिताः सर्वे धर्महीनाश्च शाश्वताः।<br>न च नः कामकारोऽयं यद् वयं पापकारिणः॥ ३२<br><br>युष्माकं चाप्रसादेन दुष्कृतेन च कर्मणा।<br>पक्षोऽयं वर्धतेऽस्माकं यतः स्मो ब्रह्मराक्षसाः॥ ३३शोणित पवित्र जल हो गया) (पर) सरस्वतीके जलको (इस प्रकार शुद्ध हुआ) देखकर राक्षस बहुत दुःखित हो गये। वे दीनतापूर्वक उन सभी मुनियोंसे बार-बार कहने लगे कि हम सभी सदा भूखे एवं धर्मसे रहित रहते हैं। हम अपनी इच्छासे पापकर्म करनेवाले पापी नहीं बने हुए हैं, अपितु आपलोगोंकी अकृपा एवं अशोभन कर्मोंसे ही हमारा पक्ष बढ़ता रहता है; क्योंकि हम सभी ब्रह्मराक्षस हैं॥ ३०—३३॥
एवं वैश्याश्च शूद्राश्च क्षत्रियाश्च विकर्मभिः।<br>ये ब्राह्मणान् प्रद्विषन्ति ते भवन्तीह राक्षसाः॥ ३४<br><br>योषितां चैव पापानां योनिदोषेण वर्द्धते।<br>इयं संततिरस्माकं गतिरेषा सनातनी॥ ३५<br><br>शक्ता भवन्तः सर्वेषां लोकानामपि तारणे।<br>तेषां ते मुनयः श्रुत्वा कृपाशीलाः पुनश्च ते॥ ३६<br><br>ऊचुः परस्परं सर्वे तप्यमानाश्च ते द्विजाः।<br>क्षुत्कीटावपन्नं च यच्चोच्छिष्टाशितं भवेत्॥ ३७<br><br>केशावपन्नमाधूतं मारुतश्वासदूषितम्।<br>एभिः संसृष्टमन्नं च भागं वै रक्षसां भवेत्॥ ३८इसी प्रकार जो क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ब्राह्मणोंसे द्वेष करते हैं, वे (ऐसे ही) विकर्म करनेके कारण राक्षस हो जाते हैं। पापिनी स्त्रियोंके योनिदोषसे हमारी यह संतति बढ़ती रहती है। यह हमारी प्राचीन गति है। आपलोग सभी लोकोंका उद्धार करनेमें समर्थ हैं। (लोमहर्षणजी कहते हैं—) द्विजो! वे कृपालु मुनि उन सदाकी रीति ब्रह्मराक्षसोंके इन वचनोंको सुनकर बहुत दुःखी हुए और परस्पर परामर्शकर उनसे बोले—(ब्रह्मराक्षसो!) छींक तथा कीटके संसर्गसे दूषित, उच्छिष्ट भोजन, केशयुक्त, तिरस्कृत एवं श्वासवायुसे दूषित अन्न तुम राक्षसोंका भाग होगा॥ ३४—३८॥
तस्माज्ज्ञात्वा सदा विद्वान् अन्यान्येतानि वर्जयेत्।<br>राक्षसानामसौ भुङ्क्ते यो भुङ्क्तेऽन्नमीदृशम्॥ ३९<br><br>शोधयित्वा तु तत्तीर्थमृषयस्ते तपोधनाः।<br>मोक्षार्थं रक्षसां तेषां संगमं तत्र कल्पयन्॥ ४०<br><br>अरुणायाः सरस्वत्याः संगमे लोकविश्रुते।<br>त्रिरात्रोपोषितः स्नातो मुच्यते सर्वकिल्बिषैः॥ ४१<br><br>प्राप्ते कलियुगे घोरे अधर्मे प्रत्युपस्थिते।<br>अरुणासंगमे स्नात्वा मुक्तिमाप्नोति मानवः॥ ४२<br><br>ततस्ते राक्षसाः सर्वे स्नाताः पापविवर्जिताः।<br>दिव्यमाल्याम्बरधराः स्वर्गस्थितिसमन्विताः॥ ४३(पुनः लोमहर्षणजी बोले—) ऋषियो! इसको जानकर विद्वान् पुरुषको चाहिये कि इस प्रकारके अन्नोंको त्याग दे। इस प्रकार अन्न खानेवाला व्यक्ति राक्षसोंका भाग खाता है। उन तपोधन ऋषियोंने उस तीर्थको शुद्धकर उन राक्षसोंकी मुक्तिके लिये वहाँ एक सङ्गमकी रचना की। [उसका फल इस प्रकार है] लोक-प्रसिद्ध अरुणा और सरस्वतीके सङ्गममें तीन दिनोंतक व्रतपूर्वक स्नान करनेवाला (व्यक्ति) सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। (आगे भी) घोर कलियुग आनेपर तथा अधर्मका अधिक प्रसार हो जानेपर मनुष्य अरुणाके सङ्गममें स्नान करके मुक्ति प्राप्त कर लेंगे। इसको सुननेके बाद उन सभी राक्षसोंने उसमें स्नान किया और वे निष्पाप हो गये तथा दिव्य माला और वस्त्र धारणकर स्वर्गमें विराजने लगे॥ ३९—४३॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें चालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४०॥

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