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वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished489 pages

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१८२श्रीवामनपुराण[ अध्याय ४२
श्लोकअर्थ
दर्शनान्मुक्तिमाप्नोति सर्वपातकवर्जितः।<br>यस्तत्र तर्पयेद् देवान् पितृंश्च श्रद्धयान्वितः ॥ १७<br><br>अक्षय्यं लभते सर्वं पितृतीर्थं विशिष्यते।<br>मातृहा पितृहा यश्च ब्रह्महा गुरुतल्पगः ॥ १८<br><br>स्नात्वा शुद्धिमवाप्नोति यत्र प्राची सरस्वती।<br>देवमार्गप्रविष्टा च देवमार्गेण निःसृता ॥ १९प्रसिद्ध सरस्वतीका एक कूप है। उसका दर्शन करनेमात्रसे ही मनुष्य सभी पापोंसे रहित हो जाता है और मुक्ति प्राप्त करता है। जो वहाँ श्रद्धापूर्वक देवता और पितरोंका तर्पण करता है, वह व्यक्ति समस्त अक्षय्य (कभी भी नष्ट न होनेवाले) पदार्थोंको प्राप्त करता है। पितृतीर्थकी विशेष महत्ता है। उस तीर्थमें माता, पिता और ब्राह्मणका घातक तथा गुरुपत्नीगामी भी स्नान करनेसे (ही) शुद्ध हो जाता है। वहीं पूर्व दिशाकी ओर बहनेवाली सरस्वती देवमार्गमें प्रविष्ट होकर देवमार्गसे ही निकली हुई है॥ १६—१९॥
प्राची सरस्वती पुण्या अपि दुष्कृतकर्मणाम्।<br>त्रिरात्रं ये करिष्यन्ति प्राचीं प्राप्य सरस्वतीम् ॥ २०<br><br>न तेषां दुष्कृतं किंचिद् देहमाश्रित्य तिष्ठति।<br>नरनारायणौ देवौ ब्रह्मा स्थाणुस्तथा रविः ॥ २१<br><br>प्राचीं दिशं निषेवन्ते सदा देवाः सवासवाः।<br>ये तु श्राद्धं करिष्यन्ति प्राचीमाश्रित्य मानवाः ॥ २२<br><br>तेषां न दुर्लभं किंचिदिह लोके परत्र च।<br>तस्मात् प्राची सदा सेव्या पञ्चम्यां च विशेषतः ॥ २३<br><br>पञ्चम्यां सेवमानस्तु लक्ष्मीवाञ्जायते नरः।<br>तत्र तीर्थमौशनसं त्रैलोक्यस्यापि दुर्लभम् ॥ २४<br><br>उशना यत्र संसिद्ध आराध्य परमेश्वरम्।<br>ग्रहमध्येषु पूज्यते तस्य तीर्थस्य सेवनात् ॥ २५पूर्ववाहिनी सरस्वती दुष्कर्मियोंके लिये भी पुण्य देनेवाली है। जो प्राची सरस्वतीके निकट जाकर त्रिरात्रव्रत करता है, उसके शरीरमें कोई पाप नहीं रह जाता। नर और नारायण—ये दोनों देव, ब्रह्मा, स्थाणु तथा सूर्य एवं इन्द्रसहित सभी देवता प्राची दिशाका सेवन करते हैं। जो मानव प्राची सरस्वतीमें श्राद्ध करेंगे, उन्हें इस लोक तथा परलोकमें कुछ भी दुर्लभ नहीं होगा। अतः प्राची सरस्वतीका सर्वदा सेवन करना चाहिये—विशेषतः पञ्चमीके दिन। पञ्चमी तिथिको प्राची सरस्वतीका सेवन करनेवाला मनुष्य लक्ष्मीवान् होता है। वहीं तीनों लोकोंमें दुर्लभ औशनस नामका तीर्थ है, जहाँ परमेश्वरकी आराधना कर शुक्राचार्य सिद्ध हो गये थे। उस तीर्थका सेवन करनेसे ग्रहोंके मध्य उनकी पूजा होती है॥ २०—२५॥
एवं शुक्रेण मुनिना सेवितं तीर्थमुत्तमम्।<br>ये सेवन्ते श्रद्दधानास्ते यान्ति परमां गतिम् ॥ २६<br><br>यस्तु श्राद्धं नरो भक्त्या तस्मिंस्तीर्थे करिष्यति।<br>पितरस्तारितास्तेन भविष्यन्ति न संशयः ॥ २७<br><br>चतुर्मुखं ब्रह्मतीर्थं सरो मर्यादया स्थितम्।<br>ये सेवन्ते चतुर्दश्यां सोपवासा वसन्ति च ॥ २८<br><br>अष्टम्यां कृष्णपक्षस्य चैत्रे मासि द्विजोत्तमाः।<br>ते पश्यन्ति परं सूक्ष्मं यस्मान्नावर्तते पुनः ॥ २९<br><br>स्थाणुतीर्थं ततो गच्छेत् सहस्रलिङ्गशोभितम्।<br>तत्र स्थाणुवटं दृष्ट्वा मुक्तो भवति किल्बिषैः ॥ ३०इस प्रकार शुक्रमुनिके द्वारा सेवित उत्तमतीर्थका जो श्रद्धापूर्वक (स्वयं) सेवन करते हैं, वे परम गतिको प्राप्त होते हैं। उस तीर्थमें भक्तिपूर्वक जो व्यक्ति श्राद्ध करेगा, उसके द्वारा उसके पितर निःसन्देह तर जायँगे। द्विजोत्तमो! जो सरोवरकी मर्यादासे स्थित चतुर्मुख ब्रह्मतीर्थमें चतुर्दशीके दिन उपवासव्रत करते हैं तथा चैत्रमासके कृष्णपक्षकी अष्टमीतक निवास करके तीर्थका सेवन करते हैं, उन्हें परम सूक्ष्म (तत्त्व)-का दर्शन प्राप्त होता है; जिससे वे पुनः संसारमें नहीं आते। ब्रह्मतीर्थके नियम पालन करनेके बाद सहस्रलिङ्गसे शोभित स्थाणुतीर्थमें जाय। वहाँ स्थाणुवटका दर्शन प्राप्त कर मनुष्य पापोंसे विमुक्त हो जाता है॥ २६—३०॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें बयालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४२॥