वामन पुराण
Vamana Purana
by महर्षि वेदव्यास
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Read in contextअध्याय ४३ ] स्थाणुतीर्थ, स्थाणुवट और सांनिहत्य सरोवरके सम्बन्धमें प्रश्न और लोमहर्षणका उत्तर १८९ विदित्वा यद् बुधः क्षिप्रं धर्मस्य फलमाप्नुयात्। योऽसावात्मनि देहेऽस्मिन् विभुर्नित्यो व्यवस्थितः ॥ ७६ सोऽनादिः स महास्थाणुः पृथक्त्वे परिसूचितः। मणिर्यथोपधानेन धत्ते वर्णोज्ज्वलोऽपि वै ॥ ७७ तन्मयो भवते तद्वदात्माऽपि मनसा कृतः। मनसो भेदमाश्रित्य कर्मभिश्चोपचीयते ॥ ७८ ततः कर्मवशाद् भुङ्क्ते संभोगान् स्वर्गनारकान्। तन्मनः शोधयेद् धीमाञ्ज्ञानयोगाद्युपक्रमैः ॥ ७९ तस्मिञ्छुद्धे ह्यन्तरात्मा स्वयमेव निराकुलः। न शरीरस्य संक्लेशैरपि निर्दहनात्मकैः ॥ ८० शुद्धिमाप्नोति पुरुषः संशुद्धं यस्य नो मनः। क्रिया हि नियमार्थाय पातकेभ्यः प्रकीर्तिताः ॥ ८१ यस्मादत्याविलं देहं न शीघ्रं शुद्ध्यते किल। तेन लोकेषु मार्गोऽयं सत्पथस्य प्रवर्तितः ॥ ८२ वर्णाश्रमविभागोऽयं लोकाध्यक्षेण केनचित्। निर्मितो मोहमाहात्म्यं चिह्नं चोत्तमभागिनाम् ॥ ८३ भवन्तः क्रोधकामाभ्यामभिभूताश्रमे स्थिताः। ज्ञानिनामाश्रमो वेश्म अनाश्रममयोगिनाम् ॥ ८४ क्व च न्यस्तसमस्तेच्छा क्व च नारीमयो भ्रमः। क्व क्रोधमीदृशं घोरं येनात्मानं न जानथ ॥ ८५ यत्क्रोधनो यजति यच्च ददाति नित्यं यद् वा तपस्तपति यच्च जुहोति तस्य। प्राप्नोति नैव किमपीह फलं हि लोके मोघं फलं भवति तस्य हि क्रोधनस्य ॥ ८६ जानकर बुद्धिमान् मनुष्य शीघ्र ही कर्मका फल प्राप्त करता है। हम सबके इस शरीरमें रहनेवाला जो नित्य विभु (परमेश्वर) है, वह आदि-अन्त-रहित एवं महा स्थाणु है। (विचार करनेपर) वह (देही) इस शरीरसे अलग प्रतीत होता है। जिस प्रकार उज्ज्वल वर्णकी मणि भी आश्रयके प्रभावसे उसी रूपकी भासती है, उसी प्रकार आत्मा भी मनसे संयुक्त होकर मनके भेदका आश्रय कर कर्मोंसे ढक जाता है। उसके बाद कर्मवश वह स्वर्गीय तथा नारकीय भोगोंको भोगता रहता है। बुद्धिमान् व्यक्तिको चाहिये कि ज्ञान तथा योग आदि उपायोंद्वारा मनका शोधन करे ॥ ७३-७९ ॥ मनके शुद्ध होनेपर अन्तरात्मा अपने-आप निर्मल हो जाता है। जिसका मन शुद्ध नहीं है, ऐसा पुरुष शरीरको सुखानेवाले क्लेशोंके द्वारा शुद्ध नहीं होता। पापोंसे बचनेके लिये ही (धर्म्य) क्रियाओंका विधान हुआ है, अतः अत्यन्त पापपूर्ण शरीर (स्वतः) शीघ्र शुद्ध नहीं होता। इसीलिये लोकमें सत्पथ-शास्त्रविहित क्रियाओंका यह मार्ग प्रवर्तित हुआ है। किसी दिव्यद्रष्टा लोक-स्वामीने उत्तम भाग्यवालोंके निमित्त मोह-माहात्म्यके प्रतीकस्वरूप इस वर्णाश्रम-विभागका निर्माण किया है ॥ ८०-८३ ॥ आपलोग आश्रममें रहते हुए भी क्रोध तथा कामके वशीभूत हैं। ज्ञानियोंके लिये घर ही आश्रम है और अयोगियों (अज्ञानियों)-के लिये आश्रम भी अनाश्रम है। कहाँ समस्त कामनाओंका त्याग और कहाँ नारीमय यह भ्रम-जाल। (कहाँ तप और) कहाँ तो इस प्रकारका क्रोध, जिससे तुमलोग अपने आत्मा (शिव)-को नहीं पहचान पाते। क्रोधी पुरुष लोकमें जो सदा यज्ञ करता है, जो दान देता है अथवा जो तप या हवन करता है, उसका कोई फल उसे नहीं मिलता। उस क्रोधीके सभी फल व्यर्थ होते हैं ॥ ८४-८६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें तैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ४३ ॥