वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished489 pages
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| २१४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४९ |
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| त्वयाभिषिञ्चितो नित्यं तीर्थस्य पुलिने स्थितः।<br>अस्य साधोः प्रसादेन स्थाणोर्देवस्य दर्शनात्॥ २८<br><br>मुक्तपापश्च स्वर्लोकं यास्ये यत्र शिवः स्थितः।<br>इत्येवमुक्त्वा राजानं प्रतिष्ठाप्य महेश्वरम्॥ २९<br><br>स्थाणुतीर्थे ययौ सिद्धिं तेन पुत्रेण तारितः।<br>स च श्वा परमां सिद्धिं स्थाणुतीर्थप्रभावतः॥ ३०<br><br>विमुक्तः कलुषैः सर्वैर्जगाम भवमन्दिरम्।<br>राजा पितॄन्नृणैर्मुक्तः परिपाल्य वसुन्धराम्॥ ३१<br><br>पुत्रानुत्पाद्य धर्मेण कृत्वा यज्ञं निरर्गलम्।<br>दत्त्वा कामांश्च विप्रेभ्यो भुक्त्वा भोगान् पृथग्विधान्॥ ३२ | तीर्थके तटपर रहने एवं तुम्हारे द्वारा नित्य अभिषिञ्चित होनेके कारण तथा इस साधुके अनुग्रह एवं स्थाणुदेवके दर्शन करनेसे मैं पापोंसे छूटकर उस स्वर्गलोकको जा रहा हूँ, जहाँ शिवजी (स्वयं) स्थित हैं। राजा पृथुसे ऐसा कहनेके पश्चात् उस पुत्रद्वारा (पापनिर्मुक्त) तारित वेनने स्थाणुतीर्थमें महेश्वरको प्रतिष्ठापित करके सिद्धि प्राप्त कर ली। स्थाणुतीर्थके प्रभावसे वह कुत्ता भी पापसे रहित होकर परम सिद्धिको प्राप्त हुआ और शिवलोकको चला गया। राजा पृथु पितृ-ऋणसे मुक्त हो गये और पृथ्वीका पालन करते हुए उन्होंने धर्मपूर्वक पुत्रोंको उत्पन्न करके बाधारहित होकर यज्ञ (यज्ञानुष्ठान) किया। उन्होंने ब्राह्मणोंको मनोऽभिलषित पदार्थोंका दान दिया तथा भाँति-भाँतिके भोगोंका उपभोग किया॥ २८–३२॥ |
| सुहृदोऽथ ऋणैर्मुक्त्वा कामैः संतर्प्य च स्त्रियः।<br>अभिषिच्य सुतं राज्ये कुरुक्षेत्रं ययौ नृपः॥ ३३<br><br>तत्र तप्त्वा तपो घोरं पूजयित्वा च शङ्करम्।<br>आत्मेच्छया तनुं त्यक्त्वा प्रयातः परं पदम्॥ ३४<br><br>एतत्प्रभावं तीर्थस्य स्थाणोर्यः शृणुयान्नरः।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तः प्रयाति परमां गतिम्॥ ३५ | मित्रोंको (भी) ऋणसे मुक्त तथा स्त्रियोंके मनोरथोंको संतुष्टि प्रदान करनेके पश्चात् पुत्रको राज्यपर अभिषिक्त कर पृथु राजा कुरुक्षेत्रमें चले गये। वहाँ घोर तपस्या तथा शङ्करका पूजन करके अपनी इच्छासे शरीरका त्याग कर उन्होंने परमपदको प्राप्त किया। जो मनुष्य स्थाणुतीर्थके इस प्रभावको सुनेगा, वह सभी पापोंसे छूट जायगा और परम गतिको प्राप्त करेगा॥ ३३–३५॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें अड़तालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४८॥
उनचासवाँ अध्याय
चार मुखोंकी उत्पत्ति-कथा, ब्रह्म-कृत शिवकी स्तुति और स्थाणुतीर्थका माहात्म्य
| मार्कण्डेय उवाच<br>चतुर्मुखानामुत्पत्तिं विस्तरेण ममानघ।<br>तथा ब्रह्मेश्वराणां च श्रोतुमिच्छा प्रवर्तते॥ १ | मार्कण्डेयने कहा— निष्पाप! चार मुखों और ब्रह्मेश्वरोंकी उत्पत्तिको विस्तारपूर्वक सुननेकी मेरी इच्छा हो रही है (अतः आप उसे सुनानेकी कृपा करें)॥ १॥ |
| सनत्कुमार उवाच<br>शृणु सर्वमशेषेण कथयिष्यामि तेऽनघ।<br>ब्रह्मणः स्रष्टुकामस्य यद् वृत्तं पद्मजन्मनः॥ २<br><br>उत्पन्न एव भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>ससर्ज सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च॥ ३ | सनत्कुमार बोले— अनघ! सृष्टिकी कामना करनेवाले एवं कमलसे उत्पन्न होनेवाले ब्रह्माका जो वृत्तान्त है, उसे मैं तुमसे पूर्णतः कहता हूँ, सुनो। लोकपितामह भगवान् ब्रह्माने उत्पन्न होते ही पहले अचर और चररूप सम्पूर्ण भूतोंकी रचना की। |